
𝐏𝐀𝐑𝐓 𝟏 — “अंधेरे का पहला संकेत”
रात के ठीक 11:47 बजे थे।
शहर की सड़कें लगभग खाली हो चुकी थीं। हवा में हल्की ठंडक थी और दूर-दूर तक स्ट्रीट लाइट की पीली रोशनी फैल रही थी।
आरव मेहरा अपनी कार तेज़ी से चला रहा था।
उसके फोन पर अभी-अभी एक अजीब कॉल आया था — एक अनजान नंबर से।
फोन उठाते ही बस एक ही आवाज़ आई थी…
“अगर सच जानना चाहते हो… तो पुरानी लाइब्रेरी आओ… अभी…”
और कॉल तुरंत कट गया।
आवाज़ इतनी धीमी थी कि वह पुरुष थी या महिला, यह भी साफ नहीं था। लेकिन उस आवाज़ में डर भी था… और चेतावनी भी।
आरव पेशे से एक इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट था।
पिछले 7 सालों में उसने कई बड़े घोटालों का पर्दाफाश किया था।
लेकिन इस कॉल में कुछ अलग था।
क्योंकि कॉल के बाद उसके फोन पर एक मैसेज आया —
“तुम्हारे पिता की मौत… एक्सीडेंट नहीं थी।”
आरव का दिल जोर से धड़कने लगा।
उसके पिता 10 साल पहले एक रहस्यमयी सड़क हादसे में मारे गए थे। पुलिस ने केस बंद कर दिया था।
लेकिन आरव को हमेशा लगता था कि उस हादसे के पीछे कोई गहरा राज़ छुपा हुआ है।
और आज… किसी ने अचानक उसी राज़ की बात छेड़ दी थी।
कार आखिरकार पुरानी सिटी लाइब्रेरी के सामने आकर रुकी।
यह लाइब्रेरी पिछले 15 साल से बंद पड़ी थी। टूटी खिड़कियाँ, जंग लगा गेट और दीवारों पर उगी काई इसे और भी डरावना बना रही थी।
आरव कार से उतरा।
चारों तरफ अजीब सी खामोशी थी।
जैसे कोई उसे देख रहा हो।
उसने धीरे से गेट को धक्का दिया।
क्रीईईक…
गेट खुद-ब-खुद खुल गया।
आरव अंदर चला गया।
लाइब्रेरी के अंदर घुप अंधेरा था। बस उसकी टॉर्च की रोशनी धूल भरी किताबों और टूटे शेल्फ़ पर पड़ रही थी।
अचानक…
ठक… ठक…
ऊपर से किसी के चलने की आवाज़ आई।
आरव ने टॉर्च ऊपर घुमाई।
सीढ़ियों पर कोई खड़ा था।
लेकिन चेहरा अंधेरे में छुपा हुआ था।
“कौन है वहाँ?” आरव ने पूछा।
कुछ सेकंड खामोशी रही।
फिर वो परछाईं धीरे-धीरे सीढ़ियों से नीचे आने लगी।
आरव का दिल तेजी से धड़कने लगा।
जैसे ही वो शख्स रोशनी में आया…
आरव की आंखें फैल गईं।
वो रिया थी।
रिया… उसकी कॉलेज फ्रेंड… जो 5 साल पहले अचानक गायब हो गई थी।
आरव हक्का-बक्का रह गया।
“रिया… तुम…?”
रिया की आँखों में डर साफ दिखाई दे रहा था।
वो तेजी से उसके पास आई और धीरे से बोली —
“तुम्हारे पास ज्यादा वक्त नहीं है, आरव…”
“कोई हमें देख रहा है।”
आरव कुछ समझ पाता उससे पहले…
धड़ाम!!!
लाइब्रेरी का दरवाज़ा जोर से बंद हो गया।
दोनों चौंक गए।
ऊपर की मंज़िल से अचानक किसी के भागने की आवाज़ आई।
रिया का चेहरा सफेद पड़ गया।
वो फुसफुसाई —
“वो लोग हमें ढूंढ चुके हैं…”
आरव ने पूछा —
“कौन लोग?”
रिया ने कांपते हुए कहा —
“जिन्होंने तुम्हारे पिता को मारा था…”
उसी वक्त…
अंधेरे में किसी ने ताली बजाई।
टप… टप… टप…
एक भारी आवाज़ गूंजी —
“बहुत अच्छा… आखिर तुम यहाँ आ ही गए… आरव मेहरा…”
टॉर्च की रोशनी जैसे ही उस दिशा में गई…
आरव का दिल रुक सा गया।
क्योंकि वहां खड़ा आदमी… वही था जिसने 10 साल पहले उसके पिता के केस की जांच की थी।
इंस्पेक्टर कबीर सिंह।
लेकिन असली डर की बात ये थी कि…
कबीर सिंह 3 साल पहले मर चुका था।
रिया ने धीरे से कहा —
“आरव… ये वही खेल है… जो 20 साल पहले शुरू हुआ था…”
और इससे पहले कि आरव कुछ पूछ पाता…
लाइब्रेरी की सारी लाइटें अचानक जल उठीं।
और चारों तरफ से काले कपड़ों में हथियारबंद लोग निकल आए।
आरव और रिया घिर चुके थे।
इंस्पेक्टर कबीर मुस्कुराया।
और बोला —
“Welcome to the truth.”