
𝐏𝐀𝐑𝐓 𝟑 – 𝐇𝐀𝐕𝐄𝐋𝐈 𝐊𝐀 𝐃𝐀𝐑𝐖𝐀𝐙𝐀
रात का समय था।
आसमान में बादल छाए हुए थे और चांद भी आधा छिपा हुआ था।
राजवीर हवेली के सामने खड़ा आरव गहरी सांस ले रहा था।
उसकी नजर हवेली की दूसरी मंजिल की खिड़की पर थी।
वहां अभी कुछ सेकंड पहले एक परछाईं दिखाई दी थी…
और वह परछाईं फिर से बिल्कुल उसी जैसी थी।
आरव के मन में डर भी था और जिज्ञासा भी।
“सच जानने के लिए अब अंदर जाना ही पड़ेगा,” उसने खुद से कहा।
हवेली के अंदर
आरव ने धीरे-धीरे हवेली का जंग लगा दरवाजा धक्का देकर खोला।
दरवाजा खुलते ही तेज आवाज हुई —
“कrrrr…”
अंदर पूरा अंधेरा था।
हवेली के अंदर धूल की मोटी परत जमी हुई थी।
दीवारों पर पुराने चित्र टंगे हुए थे, जिन पर समय की धूल साफ दिखाई दे रही थी।
हवा में अजीब सी ठंडक थी।
जैसे यह जगह अभी भी किसी का इंतजार कर रही हो।
आरव ने मोबाइल की फ्लैशलाइट ऑन की और धीरे-धीरे अंदर कदम बढ़ाया।
अजीब तस्वीर
कुछ कदम आगे बढ़ते ही उसकी नजर एक बड़ी तस्वीर पर पड़ी।
वह तस्वीर राजवीर परिवार की थी।
तस्वीर में एक आदमी, एक महिला और एक छोटा लड़का खड़े थे।
लेकिन सबसे चौंकाने वाली बात यह थी —
उस छोटे लड़के का चेहरा बिल्कुल आरव जैसा था।
आरव की आंखें फैल गईं।
“यह… यह कैसे हो सकता है?”
उसने तस्वीर को ध्यान से देखा।
तस्वीर के नीचे लिखा था —
“राजवीर परिवार, वर्ष 1924”
आरव के दिमाग में सवालों का तूफान उठने लगा।
ऊपर से आती आवाज
तभी अचानक हवेली की दूसरी मंजिल से किसी के चलने की आवाज आई।
“ठक… ठक… ठक…”
आरव का दिल तेज धड़कने लगा।
हवेली में कोई था।
वह धीरे-धीरे सीढ़ियों की तरफ बढ़ा।
सीढ़ियां बहुत पुरानी थीं और हर कदम पर आवाज कर रही थीं।
जैसे ही वह आधी सीढ़ियां चढ़ा…
अचानक ऊपर से एक दरवाजा जोर से बंद हुआ।
“धड़ाम!”
आरव डर गया, लेकिन वह वापस नहीं लौटा।
रहस्यमयी कमरा
दूसरी मंजिल पर पहुंचते ही उसे एक लंबा गलियारा दिखाई दिया।
गलियारे के आखिर में एक कमरा था…
जिसका दरवाजा थोड़ा खुला हुआ था।
उस कमरे से हल्की रोशनी आ रही थी।
यह देखकर आरव और हैरान हो गया।
“100 साल पुरानी हवेली में रोशनी कैसे हो सकती है?”
वह धीरे-धीरे उस कमरे के पास पहुंचा।
और दरवाजे को हल्का सा धक्का दिया।
सामने खड़ा वही आदमी
दरवाजा खुलते ही आरव की सांस रुक गई।
कमरे के बीचों-बीच एक आदमी खड़ा था।
और वह आदमी बिल्कुल आरव जैसा दिख रहा था।
इस बार वह साफ दिखाई दे रहा था।
वही चेहरा।
वही आंखें।
वही मुस्कान।
लेकिन उसकी आंखों में एक अजीब अंधेरा था।
जैसे वह इंसान नहीं… कोई और चीज हो।
“तुम… कौन हो?” आरव ने कांपती आवाज में पूछा।
वह आदमी धीरे-धीरे मुस्कुराया।
फिर बोला —
“मैं वही हूं… जो तुम हो।”
आरव समझ नहीं पाया।
“क्या मतलब?”
वह आदमी एक कदम आगे बढ़ा।
और बोला —
“यह शहर… हर उस इंसान की परछाई बना देता है जो यहां सच ढूंढने आता है।”
हवेली का असली खेल
आरव पीछे हटने लगा।
लेकिन तभी कमरे के दरवाजे अपने आप बंद हो गए।
“धड़ाम!”
कमरा अचानक बहुत ठंडा हो गया।
वह आदमी धीरे-धीरे आरव के पास आने लगा।
“1925 में भी एक आदमी यहां आया था,” उसने कहा।
“वह भी सच जानना चाहता था।”
आरव ने डरते हुए पूछा —
“फिर क्या हुआ?”
वह आदमी हल्के से हंसा।
“वह यहीं रह गया।”
“और उसकी जगह… उसकी परछाई बाहर चली गई।”
आरव के शरीर में सिहरन दौड़ गई।
एक और डरावना सच
तभी अचानक पीछे से किसी ने दरवाजा जोर से खटखटाया।
“आरव! दरवाजा खोलो!”
यह आवाज मीरा की थी।
आरव हैरान रह गया।
“मीरा यहां कैसे आ गई?”
लेकिन तभी सामने खड़े उस आदमी ने धीमे से कहा —
“अगर वह अंदर आ गई… तो अब उसकी भी एक परछाई बन जाएगी।”
आरव समझ गया कि कुछ बहुत भयानक होने वाला है।
दरवाजे पर खटखटाने की आवाज और तेज हो गई।
“आरव जल्दी करो!” मीरा चिल्लाई।
और तभी…
सामने खड़ा उसका हमशक्ल अचानक पूरी
राजवीर हवेली के अंदर खड़ा आरव कुछ सेकंड तक बिल्कुल स्थिर रह गया।
उसके सामने खड़ा वह आदमी… बिल्कुल उसी जैसा दिख रहा था।
वही चेहरा।
वही आंखें।
वही कद।
लेकिन उसकी आंखों में एक अजीब सा अंधेरा था।
जैसे उसके अंदर इंसान नहीं… कोई और चीज हो।
आरव की सांसें तेज हो गईं।
“तुम… कौन हो?” उसने कांपती आवाज में पूछा।
वह आदमी धीरे-धीरे मुस्कुराया।
उसकी मुस्कान में एक अजीब ठंडक थी।
फिर वह बोला —
“मैं वही हूं… जो तुम हो।”
परछाई का सच
आरव समझ नहीं पाया।
“सीधे-सीधे बोलो… तुम कौन हो?”
वह आदमी धीरे-धीरे कमरे में घूमने लगा।
उसकी चाल बिल्कुल आरव जैसी थी।
फिर उसने कहा —
“यह हवेली सिर्फ ईंट और पत्थर की इमारत नहीं है।”
“यह एक दरवाजा है।”
आरव चौंक गया।
“किस चीज का दरवाजा?”
वह आदमी धीरे से बोला —
“परछाइयों की दुनिया का।”
1925 की घटना
वह आदमी दीवार पर लगी एक पुरानी तस्वीर की तरफ इशारा करने लगा।
तस्वीर वही थी जिसे आरव ने नीचे देखा था — राजवीर परिवार की।
“1925 में इस हवेली के मालिक ने एक खतरनाक प्रयोग किया था,” वह बोला।
“वह इंसान और उसकी परछाई को अलग करना चाहता था।”
आरव ध्यान से सुन रहा था।
“लेकिन प्रयोग गलत हो गया।”
“और उसी रात… इस हवेली में परछाइयों का दरवाजा खुल गया।”
कमरे का माहौल अचानक और ठंडा हो गया।
एक डरावनी सच्चाई
आरव धीरे-धीरे पीछे हटने लगा।
“तो तुम… मेरी परछाई हो?”
वह आदमी हल्का सा हंसा।
“नहीं।”
“मैं तुम्हारी परछाई नहीं… तुम्हारा दूसरा रूप हूं।”
“वह रूप… जो इस हवेली ने बनाया है।”
आरव का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।
“और अब… तुम्हें भी यहां रहना होगा।”
अचानक मीरा की आवाज
तभी अचानक बाहर से आवाज आई —
“आरव!”
यह मीरा की आवाज थी।
वह हवेली के अंदर आ चुकी थी।
आरव चौंक गया।
“मीरा! यहां मत आओ!”
लेकिन तब तक देर हो चुकी थी।
सीढ़ियों पर कदमों की आवाज आने लगी।
“ठक… ठक… ठक…”
परछाइयों का जागना
अचानक कमरे की दीवारों पर अजीब चीज होने लगी।
दीवारों पर बनी परछाइयां हिलने लगीं।
जैसे वे जीवित हों।
कमरे का तापमान और गिर गया।
सामने खड़ा वह आदमी धीरे-धीरे अंधेरे में बदलने लगा।
और फिर उसकी आवाज गूंजने लगी —
“अब बहुत देर हो चुकी है।”
“इस हवेली ने तुम्हें चुन लिया है।”
मीरा का खुलासा
तभी दरवाजा अचानक खुल गया।
मीरा तेजी से कमरे के अंदर आई।
उसकी आंखों में डर नहीं… बल्कि गुस्सा था।
उसने सीधे उस अंधेरी आकृति की तरफ देखा।
फिर जोर से बोली —
“बस करो!”
कमरे में अचानक सन्नाटा छा गया।
आरव हैरान रह गया।
“मीरा… तुम्हें इससे डर नहीं लग रहा?”
मीरा ने धीरे से कहा —
“क्योंकि… मैं इसे बचपन से जानती हूं।”
आरव चौंक गया।
“क्या मतलब?”
मीरा की आवाज धीमी हो गई।
“क्योंकि… मेरे दादा ही वो आदमी थे जिन्होंने 1925 में यह दरवाजा खोला था।”
एक और बड़ा रहस्य
आरव के दिमाग में जैसे विस्फोट हो गया।
“क्या?!”
तभी अचानक पूरे कमरे की लाइट बुझ गई।
चारों तरफ घना अंधेरा छा गया।
और उस अंधेरे में कई आवाजें गूंजने लगीं —
फुसफुसाहटें…
हंसी…
और कदमों की आवाज।
जैसे हवेली में अब सिर्फ दो नहीं…
बल्कि सैकड़ों परछाइयां जाग चुकी हों।