अध्याय 19 – “जाल के अंदर”
गोदाम के अंदर गहरी खामोशी छा गई थी।
कंप्यूटर स्क्रीन अभी भी चमक रही थी।
और उस पर वही मैसेज दिखाई दे रहा था —
“HELLO KABIR.”
कबीर ने धीरे से कुर्सी पीछे खिसकाई।
उसके चेहरे पर पहली बार घबराहट साफ दिख रही थी।
“ये… कैसे हो सकता है?”
आरव ने शांत आवाज़ में पूछा —
“क्या वो हमारे सिस्टम में घुस चुका है?”
कबीर ने सिर हिलाया।
“सिर्फ घुसा नहीं…”
“उसने हमें ट्रेस भी कर लिया है।”
आरव की आँखें थोड़ी सिकुड़ गईं।
“मतलब?”
कबीर ने जल्दी-जल्दी कीबोर्ड दबाते हुए कहा —
“मतलब अगर हम यहाँ ज्यादा देर रुके… तो कुछ ही मिनट में सरकारी एजेंट यहाँ होंगे।”
तभी…
स्क्रीन पर फिर एक नई लाइन दिखाई दी।
“आरव… तुम्हें छुपने की जरूरत नहीं है।”
दोनों एक पल के लिए रुक गए।
आरव धीरे से स्क्रीन के पास आया।
और अगले ही पल…
स्क्रीन पर वीडियो फीड चालू हो गई।
वहीं…
इंडियन नेशनल वॉल्ट के अंदर खड़ा एजेंट आर्यन दिखाई दे रहा था।
उसकी आँखें ठंडी थीं।
चेहरा बिल्कुल शांत।
वो सीधे कैमरे की तरफ देख रहा था।
जैसे वो आरव को देख रहा हो।
फिर उसने बोलना शुरू किया।
“मुझे पता था… तुम वापस आओगे।”
कबीर ने धीरे से कहा —
“ये लाइव कनेक्शन है…”
आरव चुपचाप स्क्रीन को देखता रहा।
आर्यन आगे बोला —
“तुम हमेशा वही करते हो जो सही लगता है…”
“लेकिन इस बार… तुम गलत रास्ते पर हो।”
आरव ने पहली बार जवाब दिया।
“अगर मैं गलत हूँ… तो रास्ता तुम बताओ।”
आर्यन हल्का सा मुस्कुराया।
“विक्टर ग्रे।”
ये नाम सुनते ही कमरे की हवा भारी हो गई।
आर्यन बोला —
“वो तुम्हें इस्तेमाल कर रहा है।”
आरव शांत स्वर में बोला —
“मुझे पता है।”
आर्यन ने भौंह उठाई।
“फिर भी तुम उसकी मदद करोगे?”
आरव ने जवाब दिया —
“अगर उससे एक बेगुनाह की जान बचती है… तो हाँ।”
कुछ सेकंड के लिए स्क्रीन पर खामोशी छा गई।
फिर आर्यन ने धीरे से कहा —
“तुम अब भी नहीं बदले।”
फिर उसका चेहरा थोड़ा गंभीर हो गया।
“लेकिन मैं बदल गया हूँ।”
अचानक…
स्क्रीन पर वॉल्ट का पूरा सिक्योरिटी मैप दिखने लगा।
आर्यन बोला —
“अगर तुम सच में अंदर आना चाहते हो…”
“तो मैं तुम्हें रोकूँगा नहीं।”
कबीर चौंक गया।
“क्या?”
आर्यन ने ठंडी आवाज़ में कहा —
“क्योंकि इस बार मैं तुम्हें पकड़ना नहीं चाहता…”
“मैं तुम्हें समझना चाहता हूँ।”
फिर उसने आखिरी बात कही —
“कल रात।”
“12 बजे।”
“इंडियन नेशनल वॉल्ट।”
“अगर हिम्मत है… तो आ जाना।”
और स्क्रीन अचानक ब्लैक हो गई।
कमरे में सन्नाटा छा गया।
कबीर ने धीरे से कहा —
“ये सीधा जाल है।”
आरव ने शांत स्वर में जवाब दिया —
“मुझे पता है।”
कबीर ने पूछा —
“फिर भी जाओगे?”
आरव की आँखों में वही पुरानी खतरनाक चमक लौट आई।
“हाँ।”
“क्योंकि अब ये सिर्फ चोरी नहीं है…”
“ये तीन लोगों का खेल बन चुका है।”
“मैं… विक्टर… और एजेंट आर्यन।”
और इस खेल में…
गलती की कोई गुंजाइश नहीं थी।