अध्याय 17 – “पुराना साथी”
दिल्ली की रात गहरी हो चुकी थी।
शहर की एक पुरानी, सुनसान बिल्डिंग की छत पर आरव खड़ा था।
कुछ ही देर में पीछे से कदमों की आवाज़ आई।
“इतने साल बाद भी तुम हमेशा देर से आते हो।”
आरव ने बिना मुड़े कहा।
पीछे से हल्की हँसी सुनाई दी।
“और तुम हमेशा पहले पहुँच जाते हो।”
आरव धीरे से मुड़ा।
उसके सामने एक लंबा, दुबला आदमी खड़ा था।
चेहरे पर हल्की दाढ़ी… आँखों में शरारती चमक।
कबीर।
कभी आरव का सबसे भरोसेमंद साथी।
कबीर ने मुस्कुराते हुए कहा —
“यार… तुम सच में वापस आ गए।”
आरव ने शांत स्वर में कहा —
“ज़रूरत पड़ गई।”
कबीर ने सिर हिलाया।
“और जब भी ज़रूरत पड़ती है… दुनिया थोड़ी हिल जाती है।”
दोनों कुछ सेकंड तक एक-दूसरे को देखते रहे।
फिर कबीर बोला —
“चलो… अब बताओ, इस बार किस मुसीबत में फँस गए हो?”
आरव ने सीधे कहा —
“विक्टर वापस आ गया है।”
ये सुनते ही कबीर का चेहरा गंभीर हो गया।
“तो आखिरकार… वो दिन आ ही गया।”
आरव ने कहा —
“और उसने एक लड़की को पकड़ रखा है।”
“उसे बचाने के लिए मुझे इंडियन नेशनल वॉल्ट में घुसना होगा।”
कबीर कुछ सेकंड तक चुप रहा।
फिर अचानक हँस पड़ा।
“बस इतना सा काम?”
आरव ने हल्का सा तिरछा देखा।
“तुम्हें पता है वो जगह कैसी है।”
कबीर ने हाथ जेब में डालते हुए कहा —
“हाँ… मुझे पता है।”
“क्योंकि उसके सिक्योरिटी सिस्टम का आधा हिस्सा मैंने डिजाइन किया था।”
आरव की भौंह थोड़ी उठ गई।
“मतलब?”
कबीर मुस्कुराया।
“मतलब ये कि अंदर घुसने का रास्ता मुझे पता है।”
“लेकिन…”
आरव ने पूछा —
“लेकिन क्या?”
कबीर की आवाज़ थोड़ी धीमी हो गई।
“लेकिन इस बार मामला अलग है।”
“क्योंकि वॉल्ट में सिर्फ सिक्योरिटी गार्ड नहीं होंगे।”
“वहाँ एक और आदमी होगा…”
आरव ने पूछा —
“कौन?”
कबीर ने सीधे उसकी आँखों में देखा।
“एजेंट आर्यन।”
ये नाम सुनते ही आरव के चेहरे का भाव बदल गया।
“आर्यन…?”
कबीर ने सिर हिलाया।
“हाँ।”
“सरकार का सबसे खतरनाक एजेंट।”
“और वो आदमी… जो तुम्हें पकड़ने की कसम खा चुका है।”
कुछ सेकंड के लिए हवा भी जैसे रुक गई।
आरव धीरे से बोला —
“तो फिर…”
“इस बार सिर्फ चोरी नहीं होगी।”
कबीर मुस्कुराया।
“हाँ… इस बार असली खेल होगा।”
“क्योंकि हमें एक साथ दो दुश्मनों से बचना होगा।”
“विक्टर… और एजेंट आर्यन।”
दिल्ली की रोशनी दूर चमक रही थी।
और कहानी अब और भी खतरनाक मोड़ लेने वाली थी।