छुपी हुई विरासत – एक रहस्यमयी आदमी की कहानी

अध्याय 11 – “दिल्ली की दहलीज़”

सुबह होने से पहले ही आरव ने अपना छोटा सा बैग तैयार कर लिया था।

उस झोपड़ी में ज़्यादा सामान था भी नहीं। एक बिस्तर… कुछ किताबें… और कुछ यादें।

आरव ने आखिरी बार अपनी झोपड़ी को देखा।

“शायद अब मैं यहाँ कभी वापस न आऊँ…” उसने धीरे से कहा।

फिर वह बिना पीछे देखे चल पड़ा।


कुछ घंटे बाद…

दिल्ली।

भीड़, शोर, ट्रैफिक… हर तरफ हलचल थी।

आरव एक बस से उतरकर सड़क के किनारे खड़ा हो गया।

यह वही शहर था… जहाँ उसकी पुरानी दुनिया शुरू हुई थी।

और शायद… यहीं खत्म भी होगी।

आरव ने चारों तरफ नजर दौड़ाई।

लेकिन वह जानता था…

ब्लैक सिंडिकेट के लोग शायद पहले से ही उसे देख रहे होंगे।


उसी समय…

दिल्ली के एक आलीशान बिल्डिंग के अंदर।

एक बड़ा कमरा… दीवारों पर स्क्रीन… और बीच में एक कुर्सी।

उस कुर्सी पर एक आदमी बैठा था।

उसके सामने एक स्क्रीन पर आरव की तस्वीर दिखाई दे रही थी।

एक आदमी बोला —

“सर… आरव दिल्ली पहुँच चुका है।”

कुर्सी पर बैठा आदमी हल्का सा मुस्कुराया।

“मुझे पता था… वो आएगा।”

दूसरा आदमी बोला —

“क्या हमें उसे अभी खत्म कर देना चाहिए?”

वो आदमी धीरे से खड़ा हुआ।

कमरे की लाइट उसके चेहरे पर पड़ी… लेकिन उसका चेहरा अभी भी आधा अंधेरे में था।

“नहीं…”

उसने धीरे से कहा।

“मैं चाहता हूँ… वो खुद मेरे पास आए।”

“क्योंकि इस बार… खेल अधूरा नहीं रहेगा।”


उधर…

आरव एक पुराने होटल में कमरा लेकर बैठा था।

उसने अपने बैग से एक पुराना डिब्बा निकाला।

उस डिब्बे में एक घड़ी थी।

लेकिन वो कोई साधारण घड़ी नहीं थी।

यह उसकी विरासत का आखिरी निशान था।

आरव ने घड़ी को हाथ में लिया।

उसकी आँखों में एक पल के लिए पुरानी यादें चमक उठीं।

“पिता… मैंने वादा किया था कि मैं इस दुनिया से दूर रहूँगा…”

“लेकिन अब शायद वो वादा टूटने वाला है।”


तभी अचानक…

होटल के दरवाज़े पर दस्तक हुई।

ठक… ठक…

आरव ने धीरे से दरवाज़ा खोला।

लेकिन सामने जो खड़ा था… उसे देखकर वह एक पल के लिए चौंक गया।

दरवाज़े के बाहर एक लड़की खड़ी थी।

उसकी आँखों में डर था… और हाथ में एक छोटा सा लिफाफा।

लड़की बोली —

“क्या आप… आरव सिंह हैं?”

आरव ने धीरे से सिर हिलाया।

लड़की ने लिफाफा उसकी तरफ बढ़ा दिया।

“यह आपको देना था… किसी ने भेजा है।”

“किसने?”

आरव ने पूछा।

लड़की ने सिर हिलाया।

“मुझे नहीं पता… उन्होंने बस कहा था कि आपको दे दूँ।”

इतना कहकर वह जल्दी से वहाँ से चली गई।


आरव ने लिफाफा खोला।

उसके अंदर सिर्फ एक कागज था।

उस कागज पर सिर्फ तीन शब्द लिखे थे —

“WELCOME BACK, HEIR.”

और नीचे एक निशान बना था।

ब्लैक सिंडिकेट का चिन्ह।


आरव की आँखें ठंडी हो गईं।

वह धीरे से बोला —

“तो तुम लोग खेल शुरू कर चुके हो…”

“ठीक है।”

“अब देखना… ये खेल खत्म कौन करता है।”

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