PART 9: परछाई जो हमेशा पास थी

गेस्ट हाउस से लौटते समय हवेली पहले से ज्यादा खामोश लग रही थी।
जैसे दीवारें भी कुछ जानती हों।
सिया की बात अभी भी आरमान के कानों में गूंज रही थी—
“असली खेल माँ खेल रही हैं…”
माँ।
करण की माँ।
विक्रम की पत्नी।
शालिनी मल्होत्रा।
शालिनी मल्होत्रा
वो हमेशा साड़ी में सजी रहती थीं।
धीमी आवाज।
नपी-तुली मुस्कान।
कभी ऊँची आवाज में बात नहीं की।
लेकिन हवेली का हर नौकर उनसे डरता था।
कंपनी के हर बड़े फैसले से पहले विक्रम उनसे सलाह लेता था।
और राजवीर की मौत के बाद… सबसे ज्यादा स्थिर वही दिखीं।
अगली सुबह – डाइनिंग हॉल
लंबी टेबल पर पूरा परिवार बैठा था।
चांदी के बर्तन।
गरम चाय की भाप।
लेकिन माहौल ठंडा।
शालिनी ने पहली बार आरमान की तरफ सीधे देखा।
“कैसी नींद आई?”
आवाज़ में मिठास थी।
लेकिन आँखों में कुछ और।
आरमान ने शांत स्वर में जवाब दिया—
“सच जानने के बाद नींद कम ही आती है।”
टेबल पर चम्मच की आवाज रुक गई।
विक्रम ने भौंहें चढ़ाईं।
“क्या मतलब?”
आरमान ने सीधा शालिनी की तरफ देखा।
“मतलब… अब मुझे समझ आ रहा है कि पापा की मौत accident नहीं थी।”
कुछ सेकंड का मौन।
फिर शालिनी ने धीरे से चाय का कप रखा।
“तुम बहुत सोचते हो।”
“और ज्यादा सोचने से इंसान गलत निष्कर्ष निकाल लेता है।”
उनकी आवाज में चेतावनी छुपी थी।
रात – शालिनी का कमरा
आरमान ने तय कर लिया था—अब सीधे टकराव का समय है।
वो उनके कमरे के बाहर खड़ा था।
दरवाज़ा आधा खुला था।
अंदर से उनकी आवाज आ रही थी।
“हाँ… लड़का शक करने लगा है।”
“नहीं… अभी नहीं।”
“वक़्त आने पर…”
आरमान का दिल धड़कने लगा।
वो अंदर गया।
शालिनी ने फोन तुरंत काट दिया।
“कुछ चाहिए?”
आरमान ने बिना घुमाए पूछा—
“आपका राजवीर से क्या समझौता था?”
शालिनी की आँखों में पहली बार हल्की चमक आई।
“तुम्हें किसने बताया?”
“फाइल में आपका नाम नहीं था…”
“लेकिन संजीव के संपर्क में आप थीं।”
कमरे में भारी सन्नाटा छा गया।
फिर शालिनी धीरे से उठीं।
वो खिड़की के पास जाकर खड़ी हो गईं।
“राजवीर भावुक थे।”
“वो कंपनी तुम्हारे नाम कर रहे थे।”
“तुम्हें अंदाजा है इसका मतलब क्या था?”
“हजारों करोड़ एक अनजान लड़के के हाथ में।”
आरमान ने ठंडी आवाज में कहा—
“मैं उनका बेटा हूँ।”
शालिनी पलटीं।
“बेटा?”
“बेटे होने के लिए सिर्फ खून काफी नहीं होता।”
“ताकत चाहिए।”
“दिमाग चाहिए।”
“और निर्दयता।”
कमरा जैसे जम गया।
“तो आपने…?”
शालिनी ने सीधे जवाब नहीं दिया।
“मैंने सिर्फ संतुलन बनाए रखा।”
“अगर मैं ना होती… तो यह साम्राज्य कब का टूट चुका होता।”
आरमान ने महसूस किया—
वो सच कबूल नहीं करेंगी।
लेकिन उनकी आँखों में डर नहीं था।
जैसे उन्हें यकीन हो—सबूत कभी सामने नहीं आएगा।
उसी रात
सिया ने आरमान से कहा—
“वो सीधे वार नहीं करतीं।”
“वो लोगों को एक-दूसरे के खिलाफ इस्तेमाल करती हैं।”
“संजीव, विक्रम, करण… सब किसी न किसी समय उनके मोहरे रहे हैं।”
आरमान ने तय कर लिया।
अब वो छुपकर नहीं खेलेगा।
अब खुलेआम चाल चलेगा।
लेकिन उसे सबूत चाहिए।
और सबूत शायद वहीं है…
जहाँ से ये सब शुरू हुआ था।
राजवीर का निजी लॉकर।
PART 10 में:
• लॉकर में क्या छुपा है?
• क्या शालिनी का असली चेहरा सामने आएगा?
• या कहानी में अभी एक और बड़ा ट्विस्ट बाकी है?