PART 7: असली गद्दार
फैक्ट्री के उस सुनसान हॉल में हवा जैसे थम गई थी।
संजीव खन्ना की उँगली ट्रिगर पर थी।
उसकी आँखों में वही शांति थी… जो अक्सर खतरनाक लोगों में होती है।
“वकील साहब…?” आरमान की आवाज अविश्वास से भरी थी।
संजीव हल्का सा मुस्कुराया।
“भावुक मत बनो, आरमान।”
“इस खेल में रिश्ते नहीं… सिर्फ फायदे मायने रखते हैं।”
करण ने आगे बढ़ने की कोशिश की।
“बंदूक नीचे रखिए।”
संजीव ने बंदूक सीधी उसकी तरफ तान दी।
“एक कदम और… तो तुम्हारे पिता की तरह तुम भी ‘हादसे’ में मारे जाओगे।”
आरमान का खून खौल उठा।
“तो आपने मारा था पापा को?”
संजीव कुछ सेकंड चुप रहा।
फिर बोला—
“मैंने ट्रिगर दबाया था…”
“लेकिन कारण मैं नहीं था।”
सन्नाटा।
“मतलब?”
संजीव धीरे-धीरे उनके करीब आया।
“तुम्हारे पिता भावनाओं में बह रहे थे।”
“वो पूरी संपत्ति किसी अज्ञात वारिस के नाम करने वाले थे।”
“अगर वो वसीयत सामने आ जाती… तो मल्होत्रा साम्राज्य टूट जाता।”
करण ने दाँत भींचे।
“तो आपने लालच में आकर…”
संजीव ने उसे काट दिया—
“लालच?”
“मैं 25 साल से इस परिवार के लिए काम कर रहा था।”
“राजवीर ने कभी मुझे बराबरी का दर्जा नहीं दिया।”
“मैंने ही उनकी कंपनियाँ खड़ी कीं।”
“लेकिन नाम? सिर्फ उनका।”
आरमान ने ठंडी आवाज में कहा—
“इसलिए आपने उन्हें मार दिया?”
संजीव की आँखों में हल्की आग चमकी।
“नहीं।”
“क्योंकि मुझे मजबूर किया गया।”
“किसने?” करण ने पूछा।
संजीव की नजरें अचानक अंधेरे की तरफ गईं।
“वो… जो इस परिवार को बाहर से चला रहा है।”
आरमान और करण दोनों एक साथ बोले—
“कौन?”
संजीव ने गहरी सांस ली।
“राजवीर अकेले मालिक नहीं थे।”
“उनका एक साइलेंट पार्टनर था।”
“जिसका नाम किसी दस्तावेज़ में नहीं।”
“और जिसने मुझे आदेश दिया था—राजवीर को हटाने का।”
अचानक बाहर पुलिस सायरन की हल्की आवाज सुनाई दी।
संजीव चौका।
“तुमने पुलिस बुला ली?”
आरमान शांत था।
“नहीं।”
करण ने भी सिर हिलाया।
सायरन पास आता जा रहा था।
संजीव की आँखों में पहली बार घबराहट दिखी।
“तो फिर…?”
तभी फैक्ट्री के दूसरे दरवाज़े से कदमों की आवाज आई।
भारी… आत्मविश्वास से भरे कदम।
अंधेरे से एक आकृति बाहर आई।
और रोशनी उसके चेहरे पर पड़ी।
विक्रम मल्होत्रा।
उसके पीछे दो गार्ड्स थे।
विक्रम ने धीमे से कहा—
“खेल बहुत लंबा हो गया, संजीव।”
संजीव ने बंदूक उसकी तरफ तान दी।
“तुम भी इसमें शामिल थे!”
विक्रम हँसा।
“मैंने तुम्हें मौका दिया था।”
“लेकिन तुमने लालच दिखाया।”
आरमान अब समझ नहीं पा रहा था—
कौन सच बोल रहा है?
संजीव ने अचानक कहा—
“आरमान! अगर सच जानना है… तो हवेली के पुराने गेस्ट हाउस में जाओ।”
“वहाँ फाइल है… जिसमें असली पार्टनर का नाम है।”
विक्रम चिल्लाया—
“चुप रहो!”
अचानक गोली चली।
धांय!!!
गूंज पूरे हॉल में फैल गई।
कुछ सेकंड के लिए सब थम गया।
फिर संजीव जमीन पर गिर पड़ा।
गोली उसके सीने में लगी थी।
विक्रम के हाथ में धुआँ छोड़ती बंदूक थी।
करण चीखा—
“आपने उसे मार दिया!”
विक्रम की आवाज ठंडी थी—
“उसने मेरे भाई को मारा था।”
आरमान की आँखें विक्रम पर जमी थीं।
लेकिन मरते-मरते संजीव ने आखिरी शब्द कहे—
“साइलेंट पार्टनर… तुम्हारे बहुत करीब है…”
और उसकी साँसें थम गईं।
अब सवाल और गहरा हो गया है:
• साइलेंट पार्टनर कौन है?
• क्या विक्रम सच बोल रहा है?
• गेस्ट हाउस में कौन सी फाइल छुपी है?
• और क्या कोई अभी भी पर्दे के पीछे से सब कंट्रोल कर रहा है?
PART 8 में:
हवेली के पुराने गेस्ट हाउस का रहस्य…
और एक ऐसा नाम… जो सब कुछ बदल देगा।