छुपा हुआ अमीरज़ादा (विरासत की जंग) – A Suspense Thriller Hindi Novel

PART 6: फैक्ट्री की आधी रात

रात के 11:52 बजे।

आसमान में बादल भारी थे।

हवा में जंग और नमी की गंध घुली हुई थी।


आरमान फैक्ट्री के बाहर खड़ा था।


मल्होत्रा इंडस्ट्रीज़।


वही जगह जहाँ उसके “पिता” की मौत हुई थी।


मुख्य गेट टूटा हुआ था।

लोहे की चेन हवा से टकराकर खनखनाहट पैदा कर रही थी।


उसने मोबाइल देखा।

मैसेज फिर चमका—

“अंदर आओ। देर मत करो।”


उसने गहरी सांस ली।


आज वो भागने नहीं आया था।

आज वो जवाब लेने आया था।


अंदर का सन्नाटा

फैक्ट्री के अंदर कदम रखते ही जूतों के नीचे कांच चटका।


टूटी खिड़कियों से चाँदनी अंदर आ रही थी।


जंग लगी मशीनें ऐसे खड़ी थीं जैसे किसी हादसे की गवाह हों।


हर कोना अतीत की चीखों से भरा लग रहा था।


“कौन है?” आरमान की आवाज गूंजी।


कोई जवाब नहीं।


तभी ऊपर की मंजिल पर हल्की सी हरकत हुई।


एक परछाई रेलिंग के पीछे से गुजरी।


आरमान सीढ़ियों की तरफ बढ़ा।


हर कदम भारी था।


दिल तेज़ धड़क रहा था।


ऊपरी हॉल

ऊपर एक बड़ा हॉल था।

बीच में टूटी कुर्सी।

और फर्श पर धूल में बने ताज़ा जूतों के निशान।


अचानक पीछे से आवाज आई—


“तुम आ ही गए।”


आरमान पलटा।


सामने एक आदमी खड़ा था।


चेहरा आधा अंधेरे में।


लेकिन आवाज पहचान में आ रही थी।


“करण?”


आदमी आगे आया।


हाँ… वो करण ही था।


लेकिन उसके चेहरे पर हवेली वाली अकड़ नहीं थी।


“तुमने मैसेज भेजा?”


करण ने सिर हिलाया।


“हाँ।”


“क्यों?”


करण की आवाज धीमी हो गई।


“क्योंकि तुम अकेले नहीं हो जिसे सच जानना है।”


आरमान चौंका।


“मतलब?”


करण ने जेब से एक फोटो निकाली।


वही फोटो… जो आरमान को भेजी गई थी।


“ये मुझे दो साल पहले मिला था।”


“और तब से मैं भी सच्चाई ढूँढ रहा हूँ।”


आरमान की भौंहें सिकुड़ गईं।


“तो तुम शामिल नहीं हो?”


करण ने कड़वी हँसी हँसी।


“अगर मैं शामिल होता… तो तुम आज जिंदा नहीं होते।”


सन्नाटा।


फिर करण बोला—


“उस रात… मैं फैक्ट्री में था।”


“मैंने चाचा और पापा को बहस करते सुना।”


“लेकिन…”


वो रुक गया।


“लेकिन क्या?”


करण की आँखों में डर उतर आया।


“लेकिन गोली चाचा ने नहीं चलाई।”


आरमान का दिल धड़कना भूल गया।


“तो किसने?”


करण ने धीरे से कहा—


“वो कोई तीसरा था।”


“जिसे हम दोनों जानते हैं।”


तभी पीछे से ताली बजने की आवाज आई।


धीरे… ठंडी… खतरनाक।


दोनों ने पलटकर देखा।


अंधेरे से एक और परछाई बाहर आई।


टॉर्च की रोशनी उसके चेहरे पर पड़ी।


और आरमान की सांस अटक गई।


वो वकील… संजीव खन्ना था।


उसके हाथ में बंदूक थी।


“बहुत खोजबीन कर ली तुम दोनों ने…”


“अब खेल खत्म।”


PART 7 में:

• क्या वकील असली मास्टरमाइंड है?
• उसने राजवीर को क्यों मारा?
• और क्या विक्रम भी सिर्फ मोहरा है?

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