PART 4: तहखाने की साँसें
दरवाज़ा धीरे-धीरे खुला…
अंधेरे में सिर्फ एक परछाई दिखाई दी।
आरमान ने टेबल से रखा लोहे का पेपरवेट उठा लिया।
“कौन है?” उसकी आवाज धीमी लेकिन सख्त थी।
कुछ सेकंड सन्नाटा रहा।
फिर मोबाइल की हल्की रोशनी जली।
सिया।
“चिल्लाना मत… नीचे आओ।”
“नीचे? कहाँ?”
“तहखाने में।”
आरमान का दिल एक पल को रुक गया।
“डायरी में लिखा है वहाँ मत जाना…”
सिया की आँखों में अजीब बेचैनी थी।
“कभी-कभी सच जानने के लिए मना की हुई जगह पर ही जाना पड़ता है।”
हवेली का अंधेरा हिस्सा
दोनों चुपचाप सीढ़ियाँ उतरते गए।
हवेली के पिछले हिस्से में एक संकरा रास्ता था।
दीवारों पर पुरानी नमी के निशान।
जैसे सालों से यहाँ किसी ने कदम न रखा हो।
सीढ़ियाँ नीचे जा रही थीं।
हर कदम पर लकड़ी चरमराती।
नीचे पहुँचकर सामने एक लोहे का भारी दरवाज़ा था।
दरवाज़े पर जंग लगी थी।
“चाबी?” आरमान ने पूछा।
सिया ने जेब से पुरानी चाबी निकाली।
“ये मुझे अंकल के कमरे से मिली थी।”
चाबी घुमाई गई।
क्लिक।
दरवाज़ा खुला।
तहखाना
अंदर घुप अंधेरा था।
सिया ने टॉर्च जलाई।
कमरे में पुरानी मशीनें, टूटे बक्से और धूल से ढके फाइल कैबिनेट थे।
लेकिन बीच में एक चीज़ अलग थी।
एक छोटा सा लकड़ी का अलमारीनुमा बॉक्स।
उस पर ताला नहीं था।
आरमान ने उसे खोला।
अंदर एक रिकॉर्डिंग डिवाइस पड़ा था।
पुराना, लेकिन सुरक्षित।
सिया ने सांस रोकी।
“चलाओ इसे।”
आरमान ने प्ले बटन दबाया।
पहले सिर्फ खरखराहट।
फिर… एक आवाज।
राजवीर मल्होत्रा की।
“अगर ये रिकॉर्डिंग कोई सुन रहा है… तो समझो मैं जिंदा नहीं हूँ…”
“मुझे अपने ही भाई से खतरा है…”
आरमान का दिल जोर से धड़का।
“विक्रम सिर्फ जायदाद नहीं चाहता… वो सबूत मिटाना चाहता है…”
“अगर मेरा बेटा कभी यहाँ आए… तो उसे सच जानना होगा…”
रिकॉर्डिंग अचानक कट गई।
कमरे में सन्नाटा छा गया।
सिया ने धीमे से कहा—
“अब तुम्हें समझ आया… मैं क्यों डर रही थी?”
आरमान की आँखों में गुस्सा साफ था।
“विक्रम ने अपने ही भाई को मार दिया…”
तभी—
ऊपर से तेज़ आवाज आई।
जैसे कोई भारी चीज़ गिरी हो।
फिर कदमों की आवाज।
कोई तहखाने की सीढ़ियाँ उतर रहा था।
धीरे… भारी… नापे हुए कदम।
सिया घबरा गई।
“किसी को पता चल गया।”
आरमान ने रिकॉर्डिंग डिवाइस जेब में डाल ली।
कदम अब दरवाज़े के बाहर थे।
टॉर्च की रोशनी दरवाज़े की दरार से अंदर आई।
किसी ने हैंडल पकड़ा।
लेकिन दरवाज़ा बाहर से बंद था।
एक भारी आवाज गूंजी—
“मुझे पता है तुम अंदर हो।”
विक्रम।
“बाहर आओ… वरना मैं खुद अंदर आऊँगा।”
सिया का चेहरा पीला पड़ गया।
आरमान ने पहली बार डर से ज्यादा गुस्सा महसूस किया।
अब ये सिर्फ बचने की लड़ाई नहीं थी।
ये अपने पिता के लिए न्याय की लड़ाई थी।
लेकिन क्या विक्रम अकेला है?
या करण भी इस खेल में शामिल है?
और सबसे बड़ा सवाल—क्या रिकॉर्डिंग पूरी सच्चाई है… या सिर्फ जाल?
PART 5 में:
• क्या विक्रम उन्हें तहखाने में पकड़ लेगा?
• रिकॉर्डिंग का बाकी हिस्सा कहाँ है?
• और हवेली में कौन है जो चुपचाप सब देख रहा है?