PART 3: बंद दरवाज़ों के पीछे
सुबह के 4:47 बजे।
हवेली में गहरी खामोशी पसरी हुई थी।
आरमान की आँखें पूरी रात नहीं लगीं।
घड़ी की हर टिक उसे याद दिला रही थी कि अब वो किसी और दुनिया में है।
उसने धीरे से कमरे का दरवाज़ा खोला।
कॉरिडोर में हल्की पीली रोशनी जल रही थी।
दीवारों पर टंगी पुरानी तस्वीरें जैसे उसे घूर रही थीं।
हर कदम पर उसे लगता—कोई देख रहा है।
पुराना स्टडी रूम हवेली के पिछली तरफ था।
वही कमरा जो 20 साल से बंद था।
दरवाज़ा आधा खुला था।
आरमान अंदर दाखिल हुआ।
कमरे में धूल की हल्की परत जमी थी।
लकड़ी की भारी टेबल।
किताबों से भरी अलमारियाँ।
और सामने दीवार पर—राजवीर मल्होत्रा की बड़ी सी तस्वीर।
तभी पीछे से दरवाज़ा धीरे से बंद हुआ।
आरमान पलटा।
सिया।
उसके चेहरे पर घबराहट साफ दिख रही थी।
“तुम आ गए…” उसने धीमे से कहा।
“अब बताओ… क्या सच है?” आरमान की आवाज कठोर थी।
सिया कुछ सेकंड चुप रही।
फिर बोली—
“तुम्हारे पिता की मौत accident नहीं थी।”
कमरे की हवा भारी हो गई।
“फिर क्या था?”
“मर्डर।”
आरमान की सांस रुक गई।
“किसने?”
सिया ने सीधे जवाब नहीं दिया।
वो टेबल की तरफ बढ़ी।
उसने एक पुरानी दराज खोली।
अंदर एक डायरी थी।
“ये अंकल की personal diary है। किसी को नहीं पता कि ये यहाँ है।”
आरमान ने डायरी उठाई।
पहला पन्ना खोला।
राजवीर की लिखावट साफ थी।
“मुझे अपने ही घर में खतरा महसूस हो रहा है…”
“अगर मेरे साथ कुछ हो जाए तो समझना कि ये accident नहीं होगा…”
“सबूत फैक्ट्री में है…”
आरमान के हाथ कांप गए।
“फैक्ट्री… वही जो बंद है?”
सिया ने सिर हिलाया।
“मौत से दो दिन पहले उन्होंने किसी से बहुत बहस की थी।”
“किससे?”
सिया ने सीधे उसकी आँखों में देखा।
“विक्रम अंकल से।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
तभी बाहर से हल्की आहट आई।
दोनों चुप हो गए।
दरवाज़े के नीचे से किसी की परछाई दिखाई दी।
कोई बाहर खड़ा था।
सिया ने फुसफुसाया—
“डायरी छुपाओ।”
आरमान ने जल्दी से डायरी अपने जैकेट में डाल ली।
दरवाज़ा धीरे से खुला।
करण अंदर आया।
उसकी आँखों में शक था।
“सुबह-सुबह यहाँ क्या कर रहे हो?”
आरमान शांत रहा।
“बस… पापा के बारे में जानने आया था।”
करण मुस्कुराया।
लेकिन वो मुस्कान ठंडी थी।
“अतीत में ज्यादा मत खोओ… यहाँ लोग गायब हो जाते हैं।”
वो मुड़ा और चला गया।
दरवाज़ा बंद होते ही सिया ने गहरी सांस ली।
“वो हम पर शक कर रहा है।”
आरमान ने पहली बार गंभीर आवाज में कहा—
“अगर ये murder था… तो कातिल अभी भी इसी घर में है।”
सिया ने धीरे से कहा—
“और वो तुम्हें जिंदा नहीं देखना चाहता।”
उसी रात
आरमान अपने कमरे में डायरी पढ़ रहा था।
आखिरी पन्ने पर एक अजीब लाइन लिखी थी—
“अगर मेरा बेटा कभी इस घर में आए… तो उसे तहखाने से दूर रखना।”
तहखाना?
आरमान को याद आया—हवेली के नीचे एक बंद basement है।
जहाँ किसी को जाने की इजाज़त नहीं।
तभी अचानक—
बत्ती चली गई।
पूरा कमरा अंधेरे में डूब गया।
दरवाज़े के बाहर किसी के कदमों की आवाज आई।
धीरे… भारी… ठंडी।
कदम दरवाज़े के सामने रुक गए।
हैंडल हिला।
आरमान का दिल गले में आ गया।
और फिर—
दरवाज़ा धीरे-धीरे खुला…
PART 4 में:
• अंधेरे में कौन आया था?
• तहखाने में क्या छुपा है?
• क्या विक्रम सच में कातिल है या कोई और खेल खेल रहा है?