PART 2: हवेली के दरवाज़े
बारिश अभी भी रुकने का नाम नहीं ले रही थी।
आरमान की सांसें तेज थीं। उसके जूते कीचड़ से भर चुके थे। पीछे गली में भागते हुए उसे सिर्फ एक ही आवाज सुनाई दे रही थी—अपने दिल की।
धक… धक… धक…
पीछे से गोलियों की आवाज गूंजी।
धांय!
धांय!
वो झुककर एक बंद दुकान के शटर के पीछे छिप गया।
कुछ सेकंड बाद एक काली कार उसके सामने आकर रुकी।
दरवाज़ा खुला।
वही वकील।
“जल्दी बैठो!”
आरमान बिना सवाल किए कार में बैठ गया।
कार तेज़ी से शहर के अमीर इलाके की तरफ दौड़ पड़ी।
मल्होत्रा हवेली
करीब तीस मिनट बाद कार एक विशाल लोहे के गेट के सामने रुकी।
गेट के ऊपर सुनहरे अक्षरों में लिखा था—
“MALHOTRA ESTATE”
गार्ड्स ने सलामी दी।
गेट धीरे-धीरे खुला।
अंदर का दृश्य किसी फिल्म से कम नहीं था।
लंबा ड्राइववे।
दोनों तरफ खजूर के पेड़।
बीच में संगमरमर का फव्वारा।
और सामने—तीन मंज़िला भव्य हवेली।
आरमान कार से उतरा।
उसके गीले कपड़े, साधारण चप्पलें और उलझे बाल… इस शाही माहौल में अजनबी लग रहे थे।
“यह… मेरा घर है?” उसने धीमे से पूछा।
वकील ने गंभीर आवाज में कहा—
“अगर सब सही रहा… तो हाँ।”
हॉल में पहली मुलाकात
अंदर कदम रखते ही ठंडी हवा ने उसका स्वागत किया।
ऊपर झूमर चमक रहा था।
दीवारों पर महंगे पेंटिंग्स।
और सबसे सामने… एक बड़ी सी तस्वीर।
राजवीर मल्होत्रा।
उसके “पिता”।
आरमान की आँखें उस तस्वीर से हट नहीं रही थीं।
जैसे आईने में खुद को देख रहा हो।
तभी पीछे से आवाज आई—
“तो ये है वो लड़का?”
आरमान मुड़ा।
सीढ़ियों से तीन लोग नीचे उतर रहे थे।
विक्रम मल्होत्रा।
सूट में, चेहरे पर बनावटी मुस्कान।
करण मल्होत्रा।
तेज नजरें। आँखों में साफ नफरत।
और सिया मल्होत्रा।
शांत चेहरा… लेकिन आँखें सब देख रही थीं।
विक्रम ने हाथ बढ़ाया।
“स्वागत है… भतीजे।”
आरमान ने हाथ मिलाया।
विक्रम की पकड़ जरूरत से ज्यादा कसी हुई थी।
“आप अचानक कहाँ से आ गए?” करण ने तीखे लहजे में पूछा।
वकील बीच में बोला—
“राजवीर जी की वसीयत के अनुसार, आरमान ही कानूनी वारिस हैं।”
हॉल में सन्नाटा छा गया।
करण की मुट्ठियाँ भींच गईं।
“ये बकवास है!”
विक्रम ने उसे रोका।
“शांत रहो।”
फिर वो धीरे से बोला—
“बेटा… इस घर में रहने के कुछ नियम हैं।”
“पहला—जो दिखता है, वो सच नहीं होता।”
“दूसरा—हर कोई तुम्हारा अपना नहीं है।”
“और तीसरा—यहाँ जिंदा रहने के लिए भरोसा मत करना।”
आरमान ने सीधा जवाब दिया—
“मैं यहाँ जायदाद के लिए नहीं आया।”
करण हँसा।
“हर कोई यही कहता है।”
रात का रहस्य
उसी रात आरमान को तीसरी मंजिल का एक कमरा दिया गया।
कमरा बड़ा था। आलीशान।
लेकिन अजीब तरह से ठंडा।
उसने खिड़की से बाहर देखा।
नीचे बगीचे में कोई खड़ा था।
अंधेरे में सिर्फ सिगरेट की जलती चिंगारी दिख रही थी।
वो करण था।
और वो फोन पर कह रहा था—
“लड़का हवेली में आ चुका है…”
“प्लान बदलना पड़ेगा।”
आरमान के शरीर में सिहरन दौड़ गई।
क्या ये लोग सच में उसका परिवार हैं?
या उसकी मौत का इंतज़ार कर रहे दुश्मन?
उसे नींद नहीं आई।
रात के करीब 2 बजे—
उसके कमरे का दरवाज़ा धीरे-धीरे खुला।
किसी ने अंदर कदम रखा।
आरमान ने सांस रोक ली।
चांदनी में एक परछाई दिखी।
वो सिया थी।
उसने फुसफुसाकर कहा—
“अगर जिंदा रहना है… तो कल सुबह 5 बजे पुराने स्टडी रूम में मिलना।”
“क्यों?”
सिया की आँखों में डर था।
“क्योंकि इस घर में… तुम्हारे पिता की मौत accident नहीं थी।”
और वो चली गई।
आरमान बिस्तर पर बैठा रह गया।
पहले दिन ही उसे समझ आ गया—
यह हवेली घर नहीं… युद्धभूमि है।
PART 3 में:
• स्टडी रूम में क्या राज खुलेगा?
• सिया सच बोल रही है या जाल बिछा रही है?
• और क्या करण पहले ही अगला हमला प्लान कर चुका है?