भाग 8: अंत या नई शुरुआत
अध्याय 36: आखिरी टकराव
आरव ने माया का वार रोक लिया।
दोनों के बीच जोरदार संघर्ष शुरू हो गया।
रिया एक कोने में खड़ी कांप रही थी—
“बस करो… प्लीज़…”
लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी।
अध्याय 37: सच का बोझ
आरव ने माया की आंखों में देखा—
“मैंने गलती की… और मैं उससे भागता रहा…”
माया चीखी—
“तुम्हारी वजह से मेरी जिंदगी खत्म हो गई!”
आरव ने धीरे से कहा—
“तो आज मैं भागूंगा नहीं…”
अध्याय 38: बलिदान
अचानक आरव ने रॉड छोड़ दी।
माया चौंक गई।
“क्या कर रहे हो?”
आरव ने आंखें बंद कर लीं—
“अगर मेरी सज़ा यही है… तो मैं तैयार हूँ…”
रिया चिल्लाई—
“नहीं आरव!”
अध्याय 39: बदलता फैसला
माया का हाथ कांपने लगा।
उसकी आंखों में गुस्सा धीरे-धीरे दर्द में बदलने लगा।
“तुम… सच में हार मान रहे हो?”
आरव ने सिर हिलाया—
“मैं अपनी गलती से भागते-भागते थक गया हूँ…”
अध्याय 40: अंत का सच
कुछ पल की खामोशी…
फिर माया ने रॉड नीचे गिरा दी।
उसकी आंखों से आंसू बहने लगे।
रिया दौड़कर उसके पास आई…
दोनों बहनें एक-दूसरे से लिपट गईं।
अंतिम मोड़
अचानक…
हॉल फिर से बदलने लगा।
दीवारें गायब होने लगीं।
आईने टूटने लगे।
और धीरे-धीरे… सब कुछ अंधेरे में खो गया।
असली सच्चाई
आरव ने आंखें खोलीं।
वो एक अस्पताल के कमरे में था।
उसके हाथ में ड्रिप लगी थी।
पास में एक डॉक्टर खड़ा था।
“आपको होश आ गया…”
आरव ने कमजोर आवाज में पूछा—
“रिया… माया… कहाँ हैं?”
डॉक्टर ने गहरी सांस ली—
“वो दोनों 3 साल पहले ही मर चुकी हैं…”
अंतिम खुलासा
आरव की आंखों से आंसू निकल पड़े।
उसे सब समझ आ गया था।
ये सब…
उसके दिमाग का खेल था।
उसका अपराध… उसका डर… उसकी सज़ा।
अंत
कुछ दिन बाद…
आरव खुद पुलिस स्टेशन गया।
उसने अपना जुर्म कबूल किया।
और इस बार… वो भागा नहीं।