अंधेरे राज का दरवाज़ा – एक रोमांचक मिस्ट्री उपन्यास

भाग 3: आईने के उस पार


अध्याय 11: अकेलापन या जाल?

हॉल में सन्नाटा छा गया था।

इंस्पेक्टर वर्मा की लाश कुर्सी पर झुकी हुई थी।

आरव के हाथ कांप रहे थे।

“ये… ये कैसे हो सकता है…”

उसकी आंखों में डर साफ दिख रहा था।

तभी फिर वही आवाज—

“डर गए?”


अध्याय 12: आवाज जो दिखती नहीं

आरव ने गुस्से में चिल्लाया—

“सामने आओ!”

हॉल की दीवारों पर लगे आईने अचानक चमकने लगे।

हर आईने में… वही चेहरा।

रिया।

या माया।

हर आईने में उसकी अलग-अलग मुस्कान थी।

कहीं मासूम… कहीं डरावनी… कहीं खून से सनी।

“तुम मुझे ढूंढ नहीं सकते…” आवाज गूंजी।


अध्याय 13: खुद से सामना

अचानक एक आईना टूट गया।

कांच के टुकड़े जमीन पर बिखर गए।

आरव ने उनमें झांका…

और उसका दिल रुक गया।

क्योंकि उसमें रिया नहीं…

बल्कि खुद आरव का चेहरा दिख रहा था—खून से सना हुआ।


अध्याय 14: भूली हुई याद

आरव के दिमाग में तेज दर्द उठा।

कुछ यादें लौटने लगीं…

3 साल पहले की रात…

बारिश… चीखें…

और एक लड़की…

“मुझे मत मारो…”

आरव पीछे हट गया।

“नहीं… ये सच नहीं हो सकता…”


अध्याय 15: असली खेल

स्क्रीन फिर से चालू हुई।

लड़की सामने आई। इस बार उसका चेहरा साफ था।

“अब समझे, आरव?”

उसने धीरे से कहा—

“इस खेल का असली खिलाड़ी तुम हो।”

आरव की सांसें रुक गईं।

“क्या मतलब?”

लड़की हंसी—

“3 साल पहले… तुमने ही हमें यहां लाया था…”


क्लिफहैंगर अंत

हॉल का दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।

चारों तरफ से आवाजें आने लगीं—

“याद करो…”
“याद करो…”
“याद करो…”

आरव जमीन पर गिर पड़ा, सिर पकड़कर।

और तभी…

उसे सब याद आने लगा…

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