अंधेरे राज का दरवाज़ा – एक रोमांचक मिस्ट्री उपन्यास

अध्याय 1: आखिरी कॉल

रात के 2:17 बज रहे थे।

शहर की सड़कें सूनी पड़ी थीं। हवा में एक अजीब सा सन्नाटा था।

आरव शर्मा अपने कमरे में लैपटॉप के सामने बैठा था। स्क्रीन पर एक फाइल खुली थी — “केस नंबर 47: रिया मल्होत्रा।”

3 साल हो चुके थे।

अचानक फोन वाइब्रेट हुआ। अनजान नंबर।

“हेलो?”

दूसरी तरफ से धीमी आवाज आई — “अगर सच जानना है… तो कल सुबह 6 बजे पुरानी हवेली आ जाना…”

कॉल कट।


अध्याय 2: पुरानी हवेली

सुबह का धुंधला उजाला। हवेली के आस-पास घना जंगल। दरवाज़ा टूटा हुआ। दीवार पर लिखा था — “यहाँ आना मना है।”

आरव अंदर चला गया।

अचानक पीछे से आवाज आई — “तुम लेट हो।”

आरव पलटा।

सामने एक लड़की खड़ी थी। काली हुडी, चेहरा आधा छुपा हुआ।

“कौन हो तुम?”

लड़की ने हुडी हटाई।

आरव का दिल रुक सा गया।

“रिया…?”


अध्याय 3: सच या धोखा

“हर चीज़ वैसी नहीं होती जैसी दिखती है।”

आरव घबरा गया — “तुम ज़िंदा हो?”

रिया बस हल्का सा मुस्कुराई।

वो उसे अंदर एक पुराने दरवाज़े तक ले गई।

“इसके पीछे सब कुछ है।”


अध्याय 4: नीचे का राज

दरवाज़े के अंदर अंधेरी सीढ़ियाँ थीं। दीवारों पर तस्वीरें लगी थीं — हर तस्वीर में रिया… लेकिन हर बार अलग।

कभी हँसती हुई, कभी रोती हुई… कभी खून से लथपथ।

नीचे एक बड़ा हॉल था।

बीच में एक कुर्सी।

और उस पर… एक आदमी बंधा हुआ।

आरव आगे बढ़ा।

“इंस्पेक्टर वर्मा…?”


अध्याय 5: सच का पहला टुकड़ा

इंस्पेक्टर वर्मा ज़िंदा था। घायल।

“आरव… तुम्हें यहाँ नहीं आना चाहिए था…”

आरव चिल्लाया — “यह सब क्या है?”

रिया ने कहा — “सच।”

“कौन सा सच?”

रिया उसके करीब आई… और धीरे से बोली —

“मैं रिया नहीं हूँ।”

क्लिफहैंगर अंत

इंस्पेक्टर वर्मा चिल्लाया — “भागो आरव!”

अचानक लाइट चली गई।

पूरा हॉल अंधेरे में डूब गया।

और उसी अंधेरे में एक आवाज गूंजी —

“खेल अब शुरू होता है…

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