
रहस्यमयी उपन्यास: “अंधेरे हवेली का राज़” (Part 2) 🔮
(Mystery | Suspense | Thriller Novel in Hindi | Part 2)
आकाश का दिल जैसे सीने से बाहर निकलने वाला था।
आईने में उसका चेहरा नहीं था… सिर्फ एक काली परछाई… जो धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ रही थी।
“तुम… वापस आ गए…” — वो परछाई फुसफुसाई।
आकाश पीछे हटने लगा, लेकिन उसके पैर जैसे जमीन में जकड़ गए थे।
अचानक… आईना टूट गया!
“छन्न!!!”
टूटे हुए कांच के टुकड़ों में अब सैकड़ों परछाइयाँ दिख रही थीं… और हर परछाई में वही चेहरा था — खून से सना हुआ।
आकाश किसी तरह उस कमरे से बाहर भागा। उसकी सांसें तेज हो चुकी थीं।
लेकिन जैसे ही वो हवेली के गलियारे में पहुंचा… उसने देखा—
दीवारों पर खून से बार-बार एक ही नाम लिखा था—
“रवि… रवि… रवि…”
“ये रवि कौन है?” — आकाश ने खुद से पूछा।
तभी उसके दिमाग में एक झटका लगा…
“रवि… मेरा बचपन का दोस्त…”
एक ऐसा दोस्त… जो 20 साल पहले अचानक गायब हो गया था।
हवेली के अंदर भटकते-भटकते आकाश को एक दीवार पर अजीब सा निशान दिखा।
उसने जैसे ही उस निशान को दबाया… दीवार धीरे-धीरे खुलने लगी।
“घर्ररर…”
अंदर एक गुप्त कमरा था… पूरी तरह अंधेरा।
आकाश ने टॉर्च जलाई… और जो उसने देखा… उससे उसकी चीख निकल गई—
कमरे के बीचों-बीच एक कंकाल पड़ा था… और उसके पास एक पुरानी घड़ी।
घड़ी में समय रुका हुआ था — 2:00 AM।
आकाश धीरे-धीरे उस कंकाल के पास गया।
उसकी नजर कंकाल के हाथ में पकड़ी हुई एक चेन पर पड़ी…
“ये तो… रवि की चेन है!”
अब सब कुछ साफ होने लगा था…
“तो क्या… ये कंकाल रवि का है?”
लेकिन सवाल अभी भी बाकी था—
“रवि को किसने मारा?”
अचानक पूरे कमरे में एक डरावनी हंसी गूंजने लगी—
“हाहाहा…”
आकाश ने चारों तरफ देखा… लेकिन कोई नहीं था।
“तुम सच के करीब पहुँच रहे हो… आकाश…”
“कौन हो तुम?” — आकाश चिल्लाया।
“जिसे तुम भूल चुके हो… लेकिन जिसने तुम्हें कभी नहीं भुलाया…”
कमरे के कोने में एक पुराना कैमरा रखा था।
आकाश ने उसे चालू किया… और उसमें जो वीडियो चला… उसे देखकर उसकी आत्मा कांप उठी—
वीडियो में एक छोटा बच्चा था… और उसके सामने खड़ा था एक आदमी…
लेकिन जैसे ही कैमरा जूम हुआ…
आकाश ने देखा— वो बच्चा… खुद वो था।
और उसके हाथ में… खून से सना हुआ चाकू था।
आकाश के हाथ कांपने लगे।
“नहीं… ये झूठ है… मैंने ऐसा कुछ नहीं किया…”
लेकिन वीडियो में साफ दिख रहा था—
रवि जमीन पर पड़ा था… और आकाश उसके पास खड़ा था…
खून… हर जगह खून…
“तुम ही कातिल हो…” — वो आवाज़ फिर गूंजी।
“तुमने अपने दोस्त को मारा… और सब भूल गए…”