
रहस्यमयी उपन्यास: “अंधेरे हवेली का राज़” (Part 1) 🔮
(Mystery | Suspense | Thriller Novel in Hindi | Part 1)
रात के ठीक 12 बजे, जब पूरा शहर नींद में डूबा था, तभी अचानक आकाश के फोन पर एक मैसेज आया।
“अगर सच जानना है… तो कल रात 2 बजे ‘वर्मा हवेली’ आओ। अकेले।”
मैसेज पढ़ते ही आकाश के रोंगटे खड़े हो गए। ये नंबर अनजान था… लेकिन जो बात सबसे ज्यादा डरावनी थी, वो ये कि इस मैसेज में उसका नाम नहीं लिखा था… फिर भी उसे लग रहा था कि ये उसी के लिए है।
आकाश एक क्राइम रिपोर्टर था, और अजीब घटनाओं की खोज करना उसकी आदत बन चुकी थी। लेकिन इस बार… कुछ अलग था। कुछ ऐसा जो उसे अंदर से डरा रहा था।
अगली रात, ठीक 1:50 बजे… आकाश अपनी बाइक लेकर ‘वर्मा हवेली’ के बाहर खड़ा था।
हवेली शहर के किनारे, घने जंगल के बीच स्थित थी। लोग कहते थे कि वहाँ पिछले 20 सालों से कोई नहीं रहता… लेकिन रात में अक्सर अजीब आवाज़ें सुनाई देती हैं।
आकाश ने गहरी सांस ली… और हवेली के टूटे हुए दरवाजे को धीरे से खोला।
अंदर घुसते ही उसे एक अजीब सी ठंडक महसूस हुई… जैसे कोई अदृश्य शक्ति उसे देख रही हो।
अचानक…
“कौन है वहाँ?” — एक भारी आवाज़ गूंजी।
आकाश का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। उसने टॉर्च ऑन की… लेकिन सामने कोई नहीं था।
हवेली के अंदर चलते हुए, आकाश को एक पुराना कमरा मिला। दीवारों पर अजीब निशान बने थे… और बीच में एक टूटी हुई कुर्सी पड़ी थी।
लेकिन असली डर तो तब शुरू हुआ जब उसने दीवार पर लिखा देखा—
“आकाश… तुम वापस क्यों आए?”
ये देखकर उसके हाथ कांपने लगे।
“ये… ये मेरा नाम यहाँ कैसे?”
उसने तुरंत पीछे मुड़कर देखा… लेकिन वहाँ कोई नहीं था।
अचानक… कमरे का दरवाजा जोर से बंद हो गया!
“धड़ाम!!!”
आकाश ने खुद को संभालते हुए दरवाजा खोलने की कोशिश की… लेकिन वो लॉक हो चुका था।
तभी उसकी नजर एक पुरानी डायरी पर पड़ी, जो जमीन पर गिरी हुई थी।
उसने डायरी उठाई… और पढ़ना शुरू किया—
“दिनांक: 17 जुलाई 2005
आज हमने उसे मार दिया… लेकिन वो वापस आएगा…”
आकाश के चेहरे का रंग उड़ गया।
“ये क्या है… और ये ‘हम’ कौन हैं?”
जैसे-जैसे वो आगे पढ़ता गया… उसके सामने एक खौफनाक सच्चाई आने लगी—
वर्मा हवेली में 20 साल पहले एक मर्डर हुआ था… और उस मर्डर का गवाह… खुद आकाश था!
आकाश को अचानक अपने बचपन की कुछ धुंधली यादें आने लगीं…
एक छोटा लड़का… खून से सना हुआ कमरा… और एक आदमी जो चिल्ला रहा था—
“तुमने उसे देख लिया… अब तुम भी जिंदा नहीं रहोगे!”
“नहीं… ये सच नहीं हो सकता…” — आकाश बुदबुदाया।
तभी… कमरे के कोने में रखा आईना अपने आप हिलने लगा।
आकाश ने डरते हुए उसमें देखा… लेकिन…
उसका चेहरा गायब था।
आईने में सिर्फ एक परछाई खड़ी थी… जो धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ रही थी…