अधूरी मौत का बदला: एक पुनर्जन्म की रहस्यमयी कहानी

अध्याय 7: पहला हमला

कैफे का माहौल अचानक भारी हो गया।

बाहर बारिश तेज़ हो चुकी थी और काँच की खिड़कियों पर गिरती बूंदों की आवाज़ अंदर तक गूंज रही थी।

लेकिन आरव का ध्यान सिर्फ दरवाज़े की तरफ था।


दो आदमी कैफे के अंदर दाखिल हुए।

दोनों लंबे और मजबूत शरीर वाले थे।

काले कपड़े…

ठंडी आँखें…

और चेहरे पर कोई भाव नहीं।


सुरेश का चेहरा डर से सफेद पड़ गया।


“वो… वही लोग हैं…”


नैना ने धीरे से पूछा —


“कौन?”


सुरेश ने कांपती आवाज़ में कहा —


“विक्रम के आदमी।”


आरव की आँखें सिकुड़ गईं।


“उन्हें कैसे पता चला कि मैं यहाँ हूँ?”


सुरेश ने घबराकर कहा —


“विक्रम के पास पूरे शहर में लोग हैं… शायद किसी ने आपको बिल्डिंग में देख लिया होगा।”


दोनों आदमी धीरे-धीरे कैफे के अंदर चारों तरफ देखने लगे।


फिर उनकी नजर सीधे आरव पर आकर रुकी।


एक आदमी ने दूसरे से फुसफुसाकर कहा —


“वही है।”


नैना का दिल जोर से धड़कने लगा।


“भैया…”


आरव शांत था।


अजीब तरह से शांत।


जैसे उसे पहले से पता हो कि क्या होने वाला है।


दोनों आदमी उनके टेबल की तरफ बढ़ने लगे।


सुरेश की आवाज़ कांप रही थी।


“हमें यहाँ से भागना चाहिए…”


लेकिन आरव ने सिर हिलाया।


“अब भागने का समय खत्म हो गया है।”


दोनों आदमी अब टेबल के सामने खड़े थे।


उनमें से एक ने ठंडी आवाज़ में कहा —


“तुम आरव हो?”


आरव ने उसकी आँखों में देखते हुए जवाब दिया —


“क्यों?”


दूसरा आदमी हल्का-सा मुस्कुराया।


“क्योंकि कोई तुमसे मिलना चाहता है।”


नैना समझ गई कि यह झूठ है।


“भैया…”


लेकिन वह बात पूरी कर पाती उससे पहले ही पहला आदमी अचानक आगे बढ़ा।


उसने जैकेट के अंदर से पिस्तौल निकाल ली।


कैफे में बैठे बाकी लोग घबरा गए।


“सब लोग नीचे झुक जाओ!”


दूसरा आदमी चिल्लाया।


लोग तुरंत टेबलों के नीचे छिपने लगे।


लेकिन आरव वहीं बैठा रहा।


जैसे समय अचानक धीमा हो गया हो।


उसी पल…

उसके दिमाग में एक और याद चमकी।


एक ट्रेनिंग रूम…

और कोई उसे सिखा रहा था —


“अगर सामने वाला हथियार निकाल ले… तो सबसे पहले उसकी कलाई पर वार करो।”


आरव अचानक कुर्सी से उठा।


सब कुछ इतनी तेजी से हुआ कि किसी को समझने का मौका ही नहीं मिला।


उसने पिस्तौल पकड़े आदमी की कलाई जोर से पकड़कर मोड़ दी।


“आह!”


पिस्तौल जमीन पर गिर गई।


दूसरा आदमी तुरंत आगे बढ़ा।


लेकिन आरव ने टेबल को जोर से उसकी तरफ धक्का दे दिया।


टेबल उससे टकराकर गिर गई।


कैफे में अफरा-तफरी मच गई।


नैना चिल्लाई —


“भैया भागो!”


आरव ने तुरंत नैना और सुरेश का हाथ पकड़ा।


“चलो!”


तीनों तेजी से कैफे के पिछले दरवाज़े की तरफ भागे।


पीछे से आदमी चिल्लाए —


“उन्हें रोको!”


लेकिन तब तक वे बाहर पहुँच चुके थे।


बारिश बहुत तेज़ हो चुकी थी।


सड़क लगभग खाली थी।


तीनों भागते हुए गली के मोड़ तक पहुँचे।


कुछ सेकंड बाद वे रुक गए।


सुरेश हांफ रहा था।


“तुमने… यह सब कैसे किया?”


नैना भी हैरान थी।


“भैया… आपको फाइटिंग कब से आती है?”


आरव खुद भी थोड़ा हैरान था।


उसने धीरे से कहा —


“मुझे नहीं पता…”


फिर उसने गहरी सांस ली।


“शायद… आर्यन को आती थी।”


तीनों कुछ सेकंड तक चुप रहे।


फिर आरव ने दूर शहर की तरफ देखा।


उसकी आँखों में अब पहले से ज्यादा दृढ़ता थी।


“अब उन्हें पता चल गया है कि मैं वापस आ चुका हूँ।”


नैना ने धीरे से पूछा —


“अब क्या होगा?”


आरव की आवाज़ ठंडी हो गई।


“अब असली खेल शुरू होगा।”


लेकिन उसी समय…


सुरेश का फोन बजा।


उसने स्क्रीन देखी…

और उसका चेहरा डर से सफेद पड़ गया।


“किसका कॉल है?”


आरव ने पूछा।


सुरेश की आवाज़ कांप रही थी।


“विक्रम…”


अगला अध्याय:
अध्याय 8 – “विक्रम का पहला संदेश”

इस अध्याय में विक्रम खुद पहली बार आरव से बात करता है… और वह एक ऐसा राज़ बताता है जो पूरी कहानी को और खतरनाक बना देता है।

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