अध्याय 4: मुंबई की परछाइयाँ
तीन दिन बाद…
मुंबई सेंट्रल स्टेशन पर भीड़ का शोर गूंज रहा था।
हर तरफ लोग भाग रहे थे, ट्रेनें आ-जा रही थीं, और हवा में समुद्र की हल्की नमी घुली हुई थी।
लेकिन उस भीड़ के बीच खड़ा आरव बिल्कुल शांत था।
उसकी आँखें स्टेशन के बाहर की सड़क को देख रही थीं, जैसे वह इस शहर को पहचानने की कोशिश कर रहा हो।
“तो यही है… मुंबई।”
उसने धीरे से खुद से कहा।
नैना उसके पास खड़ी थी।
“भैया… अभी भी मुझे यकीन नहीं हो रहा कि हम सिर्फ एक सपना और कुछ यादों के कारण यहाँ आ गए।”
आरव हल्का सा मुस्कुराया।
“मुझे भी नहीं हो रहा था… जब तक मैंने यह शहर देखा नहीं था।”
उसने धीरे से चारों तरफ देखा।
अजीब बात यह थी कि इस शहर का बहुत कुछ उसे पहले से पता था।
कौन-सी सड़क कहाँ जाती है…
कौन-सा इलाका अमीर लोगों का है…
और कौन-सी जगह पर उसका ऑफिस हुआ करता था।
जैसे यह सब उसने पहले भी देखा हो।
नैना ने पूछा —
“अब कहाँ चलना है?”
आरव ने बिना सोचे जवाब दिया —
“मलाबार हिल।”
नैना चौंक गई।
“इतना महंगा इलाका?”
आरव ने टैक्सी की तरफ इशारा किया।
“वहीं मेरा घर था।”
कुछ देर बाद टैक्सी मुंबई की भीड़भाड़ वाली सड़कों से गुजरते हुए समुद्र के किनारे बने शानदार इलाके में पहुँच गई।
ऊँची-ऊँची इमारतें…
बड़े-बड़े बंगले…
और हर जगह सिक्योरिटी।
टैक्सी धीरे-धीरे एक बड़े सफेद बंगले के सामने जाकर रुकी।
जैसे ही आरव ने उस घर को देखा…
उसकी सांस रुक गई।
“यही है…”
नैना ने पूछा —
“क्या?”
आरव ने बंगले की तरफ इशारा किया।
“मेरा घर।”
गेट के पास एक बड़ा नेमप्लेट लगा था।
लेकिन उस पर लिखा नाम देखकर आरव के चेहरे का रंग बदल गया।
नेमप्लेट पर लिखा था —
“विक्रम मल्होत्रा”
नैना की आँखें फैल गईं।
“वही विक्रम?”
आरव की मुट्ठियाँ कस गईं।
“हाँ… वही।”
कुछ सेकंड तक वह बस उस घर को देखता रहा।
उसी घर में वह कभी रहता था…
उसी घर में उसने अपने सपने बनाए थे…
और शायद उसी घर से उसकी मौत की साजिश शुरू हुई थी।
तभी गेट खुला।
एक काली लक्ज़री कार धीरे-धीरे बाहर निकली।
कार की खिड़की नीचे हुई।
और अंदर बैठा आदमी साफ दिखाई देने लगा।
नैना की सांस अटक गई।
“भैया… क्या यही है…?”
आरव की आँखों में आग जल उठी।
कार के अंदर बैठा वही आदमी था।
वही चेहरा…
वही मुस्कान…
और वही आँखें।
विक्रम।
कार धीरे-धीरे सड़क पर आगे बढ़ गई।
लेकिन जाते-जाते विक्रम की नजर अचानक आरव पर पड़ी।
कुछ सेकंड के लिए उसकी आँखें ठहर गईं।
जैसे उसे कुछ अजीब महसूस हुआ हो।
फिर उसने हल्का-सा सिर झटका…
और कार आगे बढ़ गई।
नैना ने धीरे से कहा —
“क्या उसने आपको पहचान लिया?”
आरव ने सिर हिलाया।
“नहीं…”
फिर उसकी आवाज़ ठंडी हो गई।
“लेकिन जल्द ही पहचान जाएगा।”
नैना ने पूछा —
“अब क्या करेंगे?”
आरव ने बंगले को देखते हुए कहा —
“अब खेल शुरू होगा।”
उसकी आँखों में अब सिर्फ एक ही चीज़ थी।
बदला।
“विक्रम ने मेरा सब कुछ छीन लिया…”
“लेकिन इस बार…”
“मैं उससे उसका सब कुछ छीन लूँगा।”
⚡ अगला अध्याय:
अध्याय 5 – “पुराना ऑफिस, छिपा हुआ सच”
इस अध्याय में आरव अपने पुराने ऑफिस पहुँचता है और वहाँ उसे एक ऐसा आदमी मिलता है जो आर्यन शर्मा को आज भी याद करता है… और वह एक खतरनाक राज़ बताता है।