अधूरी मौत का बदला: एक पुनर्जन्म की रहस्यमयी कहानी

अध्याय 2: पिछले जन्म की पहली झलक

सुबह के सात बज चुके थे।

खिड़की से आती हल्की धूप कमरे में फैल चुकी थी, लेकिन आरव की आँखों में अब भी रात का डर बाकी था।

वह बिस्तर के किनारे बैठा हुआ था और बार-बार अपने फोन की स्क्रीन को देख रहा था।

वही नाम…

“विक्रम कॉलिंग…”

उसने फोन को कई बार देखा, जैसे उसे उम्मीद हो कि शायद यह सब एक सपना हो।

लेकिन कॉल लॉग में वह नाम साफ दिखाई दे रहा था।

आरव ने धीरे से खुद से कहा —

“मैं विक्रम नाम के किसी इंसान को नहीं जानता…”

लेकिन उसके दिमाग के अंदर कोई और आवाज़ कह रही थी —

“तुम उसे बहुत अच्छी तरह जानते हो।”


तभी कमरे का दरवाज़ा खुला।

नैना चाय का कप लेकर अंदर आई।

“भैया, रात को आपने जो कहा था… आप सच में उसे लेकर सीरियस हो?”

आरव ने उसकी तरफ देखा।

उसकी आँखों के नीचे काले घेरे साफ दिखाई दे रहे थे।

“नैना… मुझे लगता है कि मैं पागल हो रहा हूँ।”

नैना ने कप टेबल पर रखा और उसके सामने बैठ गई।

“सपना देखा था आपने… बस।”

आरव ने सिर हिलाया।

“नहीं… वो सिर्फ सपना नहीं था।”

उसने धीरे-धीरे कहा —

“जब वह आदमी मुझे मार रहा था… मैं उसका चेहरा देख सकता था।”

नैना ने पूछा —

“तो याद है चेहरा?”

आरव कुछ सेकंड तक चुप रहा।

फिर उसने धीरे से कहा —

“धुंधला… लेकिन उसकी आँखें साफ याद हैं।”

नैना ने थोड़ा मुस्कुराते हुए कहा —

“और वही आदमी आपको कॉल कर रहा है?”

आरव ने फोन उसकी तरफ बढ़ाया।

नैना की मुस्कान धीरे-धीरे गायब हो गई।

कॉल लॉग में सच में लिखा था —

“विक्रम — 3:21 AM”


“ये नंबर सेव कब किया?”

नैना ने पूछा।

आरव ने तुरंत जवाब दिया —

“कभी नहीं।”

कमरे में कुछ सेकंड के लिए सन्नाटा छा गया।


उसी समय आरव के दिमाग में अचानक तेज दर्द उठा।

“आह…!”

वह सिर पकड़कर झुक गया।

नैना घबरा गई।

“भैया क्या हुआ?”

लेकिन आरव कुछ बोल नहीं पाया।

उसकी आँखों के सामने अचानक सब कुछ बदलने लगा।


एक नया दृश्य…

जैसे कोई पुरानी फिल्म चल रही हो।

वह खुद को एक बड़े ऑफिस में खड़ा देख रहा था।

दीवार पर लिखा था —

“शर्मा इंफ्राटेक प्राइवेट लिमिटेड”

और सामने खड़ा था एक आदमी…

सूट पहने हुए।

चेहरे पर हल्की मुस्कान।


“आर्यन, हमें यह डील किसी भी कीमत पर जीतनी है।”

उस आदमी ने कहा।

आरव का दिल जोर से धड़कने लगा।

उस आदमी का चेहरा धीरे-धीरे साफ होने लगा।

और फिर…

आरव की सांस रुक गई।


वह आदमी वही था।

वही आँखें।

वही मुस्कान।


“विक्रम…”

आरव के होंठ खुद-ब-खुद यह नाम बोल बैठे।


अचानक दृश्य बदल गया।

बारिश हो रही थी।

एक सुनसान सड़क…

कार की हेडलाइट्स…

और वही आदमी उसके सामने खड़ा था।


“मुझे माफ कर देना दोस्त…”

विक्रम की आवाज़ गूँजी।

“लेकिन इस बिजनेस में दोस्ती से ज्यादा जरूरी पैसा होता है।”


चाकू चमका।

और फिर…

सब कुछ अंधेरा हो गया।


“भैया!”

नैना की आवाज़ ने आरव को झकझोर दिया।

वह वापस कमरे में था।

उसकी सांसें तेज चल रही थीं।


“आप ठीक हो?”

नैना ने घबराकर पूछा।


आरव ने धीरे-धीरे सिर उठाया।

उसकी आँखों में अब डर नहीं था।

बल्कि कुछ और था।

गुस्सा।


“अब मुझे सब समझ आ रहा है…”

उसने धीमी लेकिन ठंडी आवाज़ में कहा।


“विक्रम ने मुझे मारा था।”


नैना चौंक गई।

“क्या?”


आरव ने फोन को कसकर पकड़ लिया।


“और अगर वह इस जन्म में भी जिंदा है…”

उसकी आँखों में एक खतरनाक चमक उभरी।


“तो इस बार कहानी अलग होगी।”


“इस बार मैं मरने वाला नहीं हूँ…”


“इस बार… बदला होगा।”

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