अधूरी मौत का बदला: एक पुनर्जन्म की रहस्यमयी कहानी

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अध्याय 19 – युद्ध की शुरुआत

प्राचीन शिव मंदिर के बाहर गाड़ियों के ब्रेक की तेज आवाज़ गूंज उठी।

कुछ ही सेकंड में मंदिर के चारों तरफ हथियारबंद लोग फैल चुके थे।

कबीर सिंघानिया के आदमी हर दिशा से मंदिर को घेर चुके थे।

मंदिर के अंदर तनाव चरम पर था।

कबीर सिंघानिया की बंदूक अभी भी आरव के सीने पर तनी हुई थी।

विक्रम चुपचाप यह सब देख रहा था।

आरव की आँखों में अब अजीब सी शांति थी।

जैसे वह इस पल का इंतजार बहुत लंबे समय से कर रहा हो।

कबीर सिंघानिया ने ठंडी आवाज़ में कहा —

“तो यह है तुम्हारी कहानी?”

“पुनर्जन्म… अधूरी लड़ाई… और बदला?”

वह धीरे-धीरे आरव के करीब आया।

“मुझे कहानियाँ पसंद हैं…”

“लेकिन मैं उनका अंत जल्दी कर देता हूँ।”

उसकी उंगली ट्रिगर पर कस गई।

मंदिर के अंदर कुछ सेकंड के लिए गहरा सन्नाटा छा गया।

विक्रम की नजरें इधर-उधर घूम रही थीं।

जैसे वह किसी मौके की तलाश कर रहा हो।

अचानक आरव बोला —

“तुम्हारे पिता भी बिल्कुल ऐसे ही सोचते थे।”

कबीर की आँखों में गुस्सा चमक उठा।

“मेरे पिता का नाम मत लेना।”

आरव की आवाज़ मजबूत हो गई।

“पचास साल पहले भी तुम्हारे परिवार ने यही गलती की थी…”

“उन्होंने सोचा कि डर और ताकत से सब कुछ जीत सकते हैं।”

“लेकिन सच्चाई हमेशा लौटकर आती है।”

कबीर ने गुस्से में ट्रिगर दबाने ही वाला था कि —

अचानक…

मंदिर की लाइटें बुझ गईं।

पूरा मंदिर अंधेरे में डूब गया।

किसी ने बाहर से बिजली काट दी थी।

अंधेरे में अचानक कई गोलियों की आवाज़ गूंज उठी।

धाँय!
धाँय!
धाँय!

कबीर के आदमी घबरा गए।

“कौन है वहाँ?”

मंदिर के अंदर टॉर्च की रोशनी इधर-उधर घूमने लगी।

लेकिन उसी अंधेरे में कोई तेजी से चल रहा था।

एक के बाद एक…

कबीर के आदमी गिरने लगे।

कुछ ही सेकंड में अफरा-तफरी मच गई।

कबीर सिंघानिया गुस्से से चिल्लाया —

“सब लोग बाहर जाओ! उसे पकड़ो!”

लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

अचानक मंदिर के दरवाजे पर तेज रोशनी पड़ी।

कई पुलिस की गाड़ियाँ मंदिर के बाहर खड़ी थीं।

स्पेशल फोर्स के जवान अंदर घुस चुके थे।

“हथियार नीचे रखो!”

मंदिर के अंदर गूंजती हुई आवाज़ आई।

कबीर सिंघानिया कुछ पल के लिए हैरान रह गया।

उसने गुस्से से विक्रम की तरफ देखा।

“तुमने पुलिस को बुलाया?”

विक्रम हल्का सा मुस्कुराया।

“मैं हमेशा दो गेम खेलता हूँ।”

कबीर की आँखों में आग भर गई।

“तुमने मुझे धोखा दिया।”

विक्रम ने ठंडी आवाज़ में कहा —

“नहीं…”

“मैंने खुद को बचाया है।”

मंदिर के अंदर पुलिस और कबीर के आदमियों के बीच भीषण गोलीबारी शुरू हो गई।

अराजकता के बीच आरव तेजी से तहखाने की तरफ भागा।

उसके हाथ में वह डायरी थी।

अब उसे सिर्फ एक काम करना था —

उस फाइल को सुरक्षित बाहर निकालना।

क्योंकि वही फाइल इस पूरे साम्राज्य को खत्म कर सकती थी।

लेकिन जैसे ही वह तहखाने की सीढ़ियों के पास पहुँचा…

पीछे से किसी ने उसकी गर्दन पर बंदूक तान दी।

आरव रुक गया।

धीरे-धीरे उसने पीछे मुड़कर देखा।

और उसका चेहरा सख्त हो गया।

क्योंकि उसके पीछे खड़ा आदमी…

कोई और नहीं…

बल्कि विक्रम था।

विक्रम हल्के से मुस्कुराया।

“मुझे माफ करना, आरव।”

“लेकिन असली खेल अभी खत्म नहीं हुआ है।”

अब आरव समझ चुका था —

सबसे बड़ा धोखा अभी बाकी था। 📖🔥

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