अधूरी मौत का बदला: एक पुनर्जन्म की रहस्यमयी कहानी

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अध्याय 17 – पिछले जन्म की परछाइयाँ

मंदिर के अंदर फैली खामोशी अचानक और गहरी हो गई थी।

आरव की नजरें अभी भी उस पुरानी तस्वीर पर जमी हुई थीं।

उसका दिल तेज़ी से धड़क रहा था।

तस्वीर कम से कम पचास साल पुरानी लग रही थी…
लेकिन उसमें खड़ा आदमी बिल्कुल उसी जैसा दिख रहा था।

और नीचे लिखा नाम — “आरव सिंह”।

आरव के हाथ हल्के-हल्के कांपने लगे।

“यह… यह कैसे हो सकता है?”

विक्रम भी दीवार के पास आ गया।

उसने तस्वीर को ध्यान से देखा।

फिर धीरे से बोला —

“यह तो सच में तुम्हारे जैसा दिख रहा है।”

आरव ने गुस्से और उलझन में कहा —

“लेकिन यह असंभव है…
यह तस्वीर बहुत पुरानी है।”

विक्रम ने तस्वीर के नीचे लिखे शब्द पढ़े —

“संस्थापक – रुद्रनाथ संघ।”

उसने भौंहें सिकोड़ लीं।

“मैंने इस नाम के बारे में सुना है।”

आरव ने तुरंत पूछा —

“क्या?”

विक्रम ने धीमी आवाज़ में कहा —

“यह एक गुप्त संगठन था…
जो कई साल पहले खत्म हो गया।”

“कहते हैं कि इस संगठन का मकसद भ्रष्ट ताकतों को खत्म करना था।”

आरव का दिमाग और उलझ गया।

“मतलब… मेरे पिता उस संगठन से जुड़े थे?”

विक्रम ने सिर हिलाया।

“शायद… लेकिन इस तस्वीर में जो आदमी है…
वह तुम्हारे पिता नहीं लगते।”

उसी समय नीचे तहखाने से आवाज़ आई।

कबीर सिंघानिया के आदमी कुछ भारी चीज़ ऊपर ला रहे थे।

कुछ ही पलों बाद दो आदमी एक पुराना लोहे का बक्सा लेकर ऊपर आए।

बक्सा जंग लगा हुआ था।

लेकिन उस पर वही चिन्ह बना हुआ था —
जो आरव ने पहले देखा था।

कबीर सिंघानिया की आँखों में लालच चमक उठा।

“आखिरकार…”

उसने धीरे से कहा।

“दस साल की तलाश खत्म हुई।”

उसने अपने आदमी को इशारा किया।

बक्सा धीरे-धीरे खोला गया।

अंदर कई पुरानी फाइलें, कागज और एक मोटी डायरी रखी हुई थी।

कबीर ने तुरंत वह डायरी उठाई।

लेकिन जैसे ही उसने पहला पन्ना खोला…

उसका चेहरा अचानक बदल गया।

“यह क्या…”

आरव और विक्रम भी पास आ गए।

डायरी के पहले पन्ने पर एक तस्वीर चिपकी हुई थी।

वही चेहरा…

वही आदमी…

जो दीवार वाली तस्वीर में था।

और नीचे लिखा था —

“मैं आरव सिंह हूँ।”

“अगर यह डायरी किसी ऐसे इंसान के हाथ लगे…
जो मेरा चेहरा पहचानता हो…
तो समझ लेना कि समय फिर से लौट आया है।”

आरव की साँस रुक सी गई।

उसने कांपते हुए अगली लाइन पढ़ी —

“क्योंकि मैं वापस आऊँगा…”

“पुनर्जन्म लेकर।”

मंदिर के अंदर खामोशी छा गई।

कबीर सिंघानिया भी कुछ पल के लिए चुप हो गया।

फिर वह हँस पड़ा।

“तो यह सब एक पागल की कहानी है।”

लेकिन आरव के अंदर कुछ अजीब हो रहा था।

उसके दिमाग में अचानक अजीब-अजीब दृश्य चमकने लगे।

पुराना मंदिर…

लोगों का एक गुप्त समूह…

और एक आदमी…

जो उसी जैसा दिख रहा था।

आरव ने सिर पकड़ लिया।

उसकी साँसें तेज़ हो गईं।

विक्रम ने घबराकर पूछा —

“क्या हुआ?”

आरव धीरे से बोला —

“मुझे… कुछ याद आ रहा है…”

और उसी पल…

मंदिर की घंटी अपने आप जोर से बज उठी।

जैसे किसी ने उसे छुआ हो।

सभी लोग अचानक चौंक गए।

आरव ने धीरे-धीरे सिर उठाया।

उसकी आँखों में अब एक अजीब चमक थी।

जैसे किसी पुराने रहस्य का दरवाजा खुलने वाला हो।

क्योंकि अब…

उसका अतीत सिर्फ उसके इस जन्म का नहीं था।

बल्कि एक ऐसे पिछले जन्म का था…

जो इस कहानी को पूरी तरह बदलने वाला था। 📖🔥

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