
अध्याय 16 – तहखाने का दरवाज़ा
प्राचीन शिव मंदिर के अंदर गहरा सन्नाटा था।
मंदिर की टूटी दीवारों से आती हल्की रोशनी फर्श पर अजीब आकृतियाँ बना रही थी।
आरव, विक्रम और कबीर सिंघानिया आमने-सामने खड़े थे।
कबीर सिंघानिया के पीछे चार हथियारबंद आदमी खड़े थे।
उसके चेहरे पर वही पुरानी ठंडी मुस्कान थी।
“तुम लोग सोचते थे कि तुम मुझसे पहले यहाँ पहुँच जाओगे?”
वह धीरे-धीरे मंदिर के अंदर चलते हुए बोला।
आरव की आँखों में गुस्सा चमक उठा।
“तुम्हें इस जगह के बारे में कैसे पता चला?”
कबीर हल्का सा हँसा।
“जिस फाइल को तुम्हारे पिता ने छुपाया…
उसकी तलाश मैं पिछले दस साल से कर रहा हूँ।”
विक्रम ने ताना मारते हुए कहा —
“लेकिन फिर भी तुम्हें वह नहीं मिली।”
कबीर सिंघानिया की नजरें अचानक सख्त हो गईं।
“क्योंकि तुम्हारे पिता बहुत चालाक थे।”
वह मंदिर के बीचों-बीच बने पुराने शिवलिंग के पास आकर रुक गया।
फर्श पर पत्थरों की गोल आकृति बनी हुई थी।
जैसे वहाँ कोई गुप्त दरवाज़ा हो।
कबीर ने धीरे से कहा —
“फाइल यहीं नीचे है।”
आरव ने तुरंत शिवलिंग के चारों तरफ ध्यान से देखना शुरू किया।
अचानक उसकी नजर पत्थर के फर्श पर बने उसी प्रतीक पर पड़ी…
वही चिन्ह जो उसे कबीर की जेब से मिले कागज पर दिखाई दिया था।
उसका दिल तेजी से धड़कने लगा।
“यही है…”
वह धीरे से बुदबुदाया।
विक्रम ने पूछा —
“क्या?”
आरव झुककर पत्थर के उस चिन्ह को दबाने लगा।
पहले कुछ नहीं हुआ।
फिर अचानक…
मंदिर के अंदर एक भारी आवाज़ गूंजी।
गड़गड़ाहट के साथ शिवलिंग के पास की पत्थर की फर्श धीरे-धीरे खिसकने लगी।
नीचे अंधेरे में जाती हुई पत्थर की सीढ़ियाँ दिखाई देने लगीं।
एक गुप्त तहखाना खुल चुका था।
मंदिर के अंदर ठंडी हवा का झोंका भर गया।
कबीर सिंघानिया की आँखों में चमक आ गई।
“आखिरकार…”
वह मुस्कुराया।
“दस साल की तलाश खत्म हुई।”
उसने अपने आदमियों को इशारा किया।
“नीचे जाओ।”
दो आदमी टॉर्च लेकर सीढ़ियों से नीचे उतरने लगे।
आरव भी आगे बढ़ा।
लेकिन तभी कबीर ने बंदूक उसकी तरफ तान दी।
“तुम नहीं।”
आरव रुक गया।
कबीर बोला —
“फाइल मिलने के बाद…
तुम दोनों की जरूरत खत्म हो जाएगी।”
विक्रम गुस्से से चिल्लाया —
“तुम हमें मार दोगे?”
कबीर सिंघानिया शांत आवाज़ में बोला —
“यह दुनिया कमजोर लोगों के लिए नहीं है।”
उसी समय नीचे से टॉर्च की रोशनी हिलती दिखाई दी।
एक आदमी ऊपर चिल्लाया —
“सर! यहाँ कुछ है!”
कबीर सिंघानिया तुरंत सीढ़ियों की तरफ बढ़ा।
उसकी आँखों में लालच साफ दिखाई दे रहा था।
लेकिन जैसे ही वह नीचे उतरने लगा…
आरव की नजर मंदिर की दीवार पर पड़ी एक पुरानी तस्वीर पर गई।
वह तस्वीर आधी टूटी हुई थी।
लेकिन उसमें एक आदमी साफ दिखाई दे रहा था।
आरव का दिल अचानक रुक सा गया।
क्योंकि उस तस्वीर में जो आदमी खड़ा था…
वह बिल्कुल उसके पिता जैसा दिख रहा था।
लेकिन तस्वीर के नीचे जो नाम लिखा था…
उसे पढ़कर आरव के पैरों तले जमीन खिसक गई।
उस नाम के नीचे लिखा था —
“संस्थापक – रुद्रनाथ संघ”
और उसके बाद जो नाम था…
वह था —
“आरव सिंह।”
आरव का दिमाग सुन्न हो गया।
“यह… कैसे हो सकता है?”
क्योंकि वह नाम उसका अपना था।
और वह तस्वीर…
कम से कम पचास साल पुरानी लग रही थी।
अब आरव को पहली बार महसूस हुआ —
यह कहानी सिर्फ फाइल और बदले की नहीं है।
इसके पीछे कोई और भी गहरा रहस्य छुपा हुआ है।
शायद…
पुनर्जन्म का। 📖🔥