
अध्याय 15 – मंदिर का रास्ता
सुबह की हल्की रोशनी कमरे में फैल रही थी, लेकिन माहौल भारी था।
आरव और विक्रम आमने-सामने खड़े थे।
दोनों की आँखों में एक ही चीज़ साफ दिखाई दे रही थी —
सच्चाई तक पहुँचने की जिद।
आरव ने गुस्से से कहा —
“तुम यहाँ क्यों आए हो?”
विक्रम हल्का सा मुस्कुराया।
“क्योंकि मुझे पता है कि तुम उस फाइल तक पहुँचने वाले हो।”
वह धीरे-धीरे कमरे के अंदर घूमने लगा।
“और सच कहूँ…
मुझे भी वह फाइल चाहिए।”
आरव की आँखें सिकुड़ गईं।
“तुम्हें क्यों?”
विक्रम ने गहरी साँस ली।
“क्योंकि अगर वह फाइल पुलिस के हाथ लग गई…
तो सिर्फ कबीर सिंघानिया ही नहीं…
मैं भी खत्म हो जाऊँगा।”
कमरे में कुछ सेकंड के लिए खामोशी छा गई।
आरव ने धीरे से कहा —
“तो तुम चाहते क्या हो?”
विक्रम ने सीधा जवाब दिया —
“सौदा।”
आरव हँस पड़ा।
“मैं तुम्हारे साथ सौदा क्यों करूँ?”
विक्रम ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा —
“क्योंकि उस मंदिर तक पहुँचने का रास्ता तुम्हें नहीं पता।”
यह सुनकर आरव कुछ पल के लिए चुप हो गया।
विक्रम ने जेब से एक पुराना नक्शा निकाला और टेबल पर रख दिया।
नक्शे पर पहाड़ियों के बीच एक जगह गोल घेरे में बनी हुई थी।
उसके ऊपर लिखा था —
“प्राचीन शिव मंदिर”
आरव ने नक्शे को ध्यान से देखा।
यह मंदिर शहर से बहुत दूर…
घने जंगलों के बीच था।
जहाँ शायद ही कोई जाता हो।
विक्रम बोला —
“यह मंदिर लगभग सौ साल पुराना है।”
“और उसके नीचे एक गुप्त तहखाना है।”
आरव ने तुरंत पूछा —
“तुम्हें यह सब कैसे पता?”
विक्रम हल्का सा हँसा।
“क्योंकि तुम्हारे पिता अकेले नहीं थे।”
“मैं भी उस समय उस फाइल के बारे में जानता था।”
यह सुनकर आरव की मुट्ठियाँ कस गईं।
“मतलब…
तुम भी उस साजिश में शामिल थे।”
विक्रम ने बिना झिझक सिर हिलाया।
“हाँ।”
“लेकिन अब हालात बदल चुके हैं।”
वह टेबल के पास झुककर बोला —
“अगर हम दोनों साथ नहीं गए…
तो कबीर सिंघानिया उस फाइल तक पहले पहुँच जाएगा।”
आरव ने कुछ पल सोचा।
उसे विक्रम पर बिल्कुल भरोसा नहीं था।
लेकिन एक बात साफ थी —
वह अकेले उस मंदिर तक नहीं पहुँच सकता था।
आखिरकार उसने धीमी आवाज़ में कहा —
“ठीक है।”
विक्रम की मुस्कान और गहरी हो गई।
“मुझे पता था तुम मान जाओगे।”
उसी शाम
एक काली SUV शहर से बाहर निकल रही थी।
कार के अंदर आरव और विक्रम बैठे थे।
दोनों चुप थे।
कार पहाड़ियों की तरफ बढ़ रही थी।
जंगल धीरे-धीरे घना होता जा रहा था।
कुछ देर बाद सड़क खत्म हो गई।
अब आगे सिर्फ कच्चा रास्ता था।
विक्रम ने कार रोक दी।
“आगे हमें पैदल जाना होगा।”
दोनों कार से बाहर निकले।
जंगल में अजीब सी खामोशी थी।
पेड़ों के बीच से हवा की आवाज़ आ रही थी।
करीब बीस मिनट चलने के बाद…
उन्हें दूर एक पुरानी पत्थर की इमारत दिखाई दी।
वह था —
प्राचीन शिव मंदिर।
मंदिर आधा टूट चुका था।
दीवारों पर काई जमी हुई थी।
और चारों तरफ घना सन्नाटा था।
आरव धीरे-धीरे मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़ने लगा।
उसका दिल तेजी से धड़क रहा था।
क्योंकि उसे लग रहा था —
यहाँ सिर्फ फाइल ही नहीं…
बल्कि उसके पिता से जुड़ा सबसे बड़ा सच छुपा हुआ है।
लेकिन जैसे ही वह मंदिर के अंदर पहुँचा…
उसके कदम अचानक रुक गए।
क्योंकि मंदिर के अंदर पहले से ही कोई खड़ा था।
और वह आदमी कोई और नहीं…
बल्कि कबीर सिंघानिया था।
उसके साथ कई हथियारबंद लोग भी थे।
कबीर सिंघानिया मुस्कुराते हुए बोला —
“तुम दोनों को आने में काफी देर लग गई।”
अब आरव समझ चुका था —
असली लड़ाई यहीं होने वाली है।
और इस मंदिर के अंदर छुपा हुआ सच…
अब ज्यादा देर तक छुपा नहीं रहेगा। 📖🔥