अधूरी मौत का बदला: एक पुनर्जन्म की रहस्यमयी कहानी

अध्याय 11 – धोखे का चेहरा

डॉकयार्ड गोलियों की आवाज़ से गूंज रहा था।

हर तरफ धुआँ फैल चुका था।
पुलिस और कबीर सिंघानिया के आदमियों के बीच भीषण गोलीबारी शुरू हो चुकी थी।

आरव तुरंत एक बड़े लोहे के कंटेनर के पीछे छिप गया।

उसका दिल तेजी से धड़क रहा था, लेकिन दिमाग पूरी तरह शांत था।

उसे पता था — यह लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है।

दूर खड़ा विक्रम अपने आदमियों को चिल्लाकर आदेश दे रहा था।

“उसे जिंदा मत छोड़ना!”

कबीर सिंघानिया धीरे-धीरे पीछे हट रहा था।

उसके चेहरे पर घबराहट नहीं थी।
बल्कि ऐसा लग रहा था जैसे वह पहले से ही इस स्थिति के लिए तैयार हो।

आरव ने मौका देखकर तेजी से दूसरी तरफ भागने की कोशिश की।

लेकिन तभी उसके सामने एक बंदूक तान दी गई।

आरव अचानक रुक गया।

उसने ऊपर देखा…

और अगले ही पल उसका चेहरा हैरानी से जम गया।

उसके सामने खड़ा था — कबीर।

आरव का सबसे करीबी दोस्त।

वही दोस्त जिसने हर मुश्किल में उसका साथ दिया था।

वही दोस्त जिसने उसे सच तक पहुँचने में मदद की थी।

लेकिन इस समय…

उसके हाथ में बंदूक थी।

आरव की तरफ तनी हुई।

आरव की आवाज़ काँप गई।

“क… कबीर?”

कबीर की आँखों में अजीब सी ठंडक थी।

“सॉरी, आरव।”

“लेकिन हर कहानी में एक ऐसा किरदार होता है…
जो हीरो के सबसे करीब होता है,
और वही सबसे बड़ा धोखा देता है।”

आरव को जैसे यकीन ही नहीं हो रहा था।

“तुम… कबीर सिंघानिया के लिए काम करते हो?”

कबीर हल्का सा मुस्कुराया।

“नहीं।”

“मैं सिर्फ उसके लिए काम नहीं करता…”

“मैं उसका आदमी हूँ।”

आरव की मुट्ठियाँ भींच गईं।

“तो तुम शुरू से मेरे साथ झूठ बोल रहे थे?”

कबीर ने गहरी सांस ली।

“शुरू में नहीं।”

“लेकिन जब मुझे पता चला कि तुम सच्चाई तक पहुँच सकते हो…
तो मुझे तुम्हारे करीब रहना पड़ा।”

आरव की आँखों में दर्द साफ दिखाई दे रहा था।

“तो हमारी दोस्ती भी झूठ थी?”

कुछ सेकंड के लिए कबीर चुप रहा।

फिर उसने धीरे से कहा —

“नहीं…
वह सच थी।”

“लेकिन इस खेल में सच की कीमत बहुत ज्यादा होती है।”

उसी समय दूर से कबीर सिंघानिया की आवाज़ आई —

“कबीर! खत्म करो उसे!”

कबीर ने बंदूक और कसकर पकड़ ली।

उसकी उंगली ट्रिगर पर थी।

आरव उसकी आँखों में देख रहा था।

दोनों के बीच कुछ सेकंड की खामोशी छा गई।

जैसे समय ही रुक गया हो।

फिर अचानक…

एक और गोली चली।

लेकिन यह गोली कबीर की बंदूक से नहीं चली थी।

गोली आकर सीधे कबीर के कंधे में लगी।

कबीर दर्द से चिल्ला उठा और जमीन पर गिर पड़ा।

आरव ने तुरंत मुड़कर देखा।

दूर खड़ा था — विक्रम।

उसके हाथ में बंदूक थी।

विक्रम गुस्से से चिल्लाया —

“मुझे पता था तुम कमजोर पड़ जाओगे!”

अब पूरा डॉकयार्ड फिर से गोलियों की आवाज़ से गूंजने लगा।

आरव समझ चुका था —

यह खेल अब और भी खतरनाक मोड़ लेने वाला है।

क्योंकि अब दुश्मन सिर्फ सामने नहीं था…

बल्कि दोस्त और दुश्मन की पहचान भी धुंधली हो चुकी थी।

और असली सच अभी भी छुपा हुआ था। 📖🔥

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top