अधूरी मौत का बदला: एक पुनर्जन्म की रहस्यमयी कहानी

अध्याय 10 – जाल के अंदर

रात के साढ़े ग्यारह बजे थे।

समुद्र के किनारे बना पुराना डॉकयार्ड धुंध से ढका हुआ था।
लहरों की आवाज़ लगातार गूंज रही थी और हवा में नमक की गंध घुली हुई थी।

चारों तरफ जंग लगे कंटेनर, टूटी हुई क्रेन और घना अंधेरा फैला हुआ था।

यहीं आने के लिए आरव को मजबूर किया गया था।

कुछ देर पहले उसके फोन पर एक मैसेज आया था —

“अगर सच जानना है…
तो आज रात डॉकयार्ड नंबर 17 आओ।
अकेले।”

मैसेज के नीचे सिर्फ एक नाम लिखा था —

विक्रम।

आरव जानता था कि यह एक जाल हो सकता है।

फिर भी वह यहाँ आया।

क्योंकि अब उसके लिए सच जानना सबसे जरूरी था।

आरव धीरे-धीरे डॉकयार्ड के अंदर बढ़ने लगा।

उसकी नजरें हर दिशा में घूम रही थीं।
हर आवाज़ पर वह सतर्क हो जाता था।

अचानक अंधेरे में ताली बजने की आवाज़ गूंजी।

“वाह… मुझे पता था कि तुम जरूर आओगे।”

आरव तुरंत मुड़ा।

एक बड़े कंटेनर के ऊपर विक्रम खड़ा था।

उसके पीछे चार-पाँच हथियारबंद आदमी भी खड़े थे।

आरव ने शांत लेकिन ठंडी आवाज़ में कहा —

“तुमने मुझे यहाँ क्यों बुलाया है?”

विक्रम हल्का सा मुस्कुराया।

“क्योंकि तुम बहुत ज्यादा सवाल पूछने लगे हो।”

वह धीरे-धीरे कंटेनर से नीचे उतरने लगा।

“और जो लोग सच के बहुत करीब पहुँच जाते हैं…
उनका अंत अक्सर अच्छा नहीं होता।”

आरव की आँखें सिकुड़ गईं।

“मेरे पिता की मौत…
क्या वह सच में एक्सीडेंट थी?”

कुछ सेकंड के लिए पूरा माहौल शांत हो गया।

फिर अचानक विक्रम जोर से हँस पड़ा।

“तुम सच में बहुत भोले हो, आरव।”

उसी समय पीछे से एक और आवाज़ आई —

“उसे सच बता ही दो, विक्रम।”

आरव तुरंत पीछे मुड़ा।

अंधेरे से एक आदमी धीरे-धीरे बाहर आया।

महंगा सूट… ठंडी मुस्कान… और आँखों में अजीब आत्मविश्वास।

यह था — कबीर सिंघानिया।

शहर का सबसे ताकतवर बिज़नेसमैन।

आरव हैरान रह गया।

“आप… यहाँ?”

कबीर धीरे-धीरे उसके सामने आकर खड़ा हो गया।

“हाँ आरव… क्योंकि यह खेल सिर्फ विक्रम का नहीं है।”

उसने हल्की मुस्कान के साथ कहा —

“यह खेल मेरा है।”

आरव के दिमाग में जैसे बिजली कौंध गई।

“मतलब… मेरे पिता की मौत…”

कबीर ने उसकी बात पूरी की —

“हाँ।
वह एक्सीडेंट नहीं था।”

आरव की मुट्ठियाँ कस गईं।

“क्यों?”

कबीर की आँखों में कोई पछतावा नहीं था।

“क्योंकि तुम्हारे पिता हमारे रास्ते में आ रहे थे।”

विक्रम हँसते हुए बोला —

“और अब तुम भी।”

अचानक चारों तरफ से बंदूकें आरव की तरफ तान दी गईं।

अब आरव पूरी तरह जाल में फँस चुका था।

कबीर ने घड़ी की तरफ देखा।

“मुझे ज्यादा समय बर्बाद करना पसंद नहीं है।”

फिर उसने विक्रम से कहा —

“खत्म करो इसे।”

विक्रम ने बंदूक उठाई और आरव की तरफ निशाना साधा।

लेकिन उसी पल एक जोरदार धमाका हुआ।

डॉकयार्ड के गेट पर पुलिस की गाड़ियाँ घुस आईं।

सायरन की आवाज़ पूरे इलाके में गूंज उठी।

विक्रम और कबीर दोनों चौंक गए।

आरव हल्का सा मुस्कुराया।

विक्रम गुस्से से चिल्लाया —

“तुमने पुलिस को बुलाया?”

आरव ने शांत आवाज़ में कहा —

“नहीं।”

उसने अपनी जैकेट से एक छोटा रिकॉर्डिंग डिवाइस निकाला।

“आप दोनों ने अभी जो कुछ कहा…
सब रिकॉर्ड हो चुका है।”

कबीर का चेहरा पहली बार बदल गया।

लेकिन अगले ही पल वह फिर मुस्कुरा दिया।

“तुमने अच्छा खेला, आरव।”

फिर उसने धीमी आवाज़ में कहा —

“लेकिन खेल अभी खत्म नहीं हुआ है।”

उसने अपने आदमियों को इशारा किया।

अगले ही सेकंड गोलियों की आवाज़ गूंजने लगी।

पूरा डॉकयार्ड धुएँ, गोलियों और अफरातफरी से भर गया।

आरव समझ चुका था —

अब यह सिर्फ सच की लड़ाई नहीं रही।

यह अब जिंदगी और मौत का खेल बन चुका था।

और असली युद्ध अभी शुरू हुआ था। 📖🔥

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