छुपा हुआ अमीरज़ादा (विरासत की जंग) – A Suspense Thriller Hindi Novel

Chapter 1: वह रात जिसने सब बदल दिया

बारिश की बूंदें टिन की छत पर लगातार पड़ रही थीं।

कमरे में एक हल्की सी सीलन की गंध थी।
दीवारों का पेंट उखड़ा हुआ था।
टेबल पर बिखरे हुए rejection letters हवा में हल्के-हल्के हिल रहे थे।

आरमान कुर्सी पर झुका बैठा था।

उसकी उंगलियाँ माथे पर टिकी थीं।

“कितनी कोशिश करूँ…?” उसने खुद से बुदबुदाया।

उसकी उम्र सिर्फ 24 साल थी।
लेकिन आँखों में थकान 40 साल की लगती थी।

मोबाइल स्क्रीन पर बैंक बैलेंस दिख रहा था — ₹1,842

वो हँसा।

“इतने में तो महीने की आधी किराया भी नहीं जाएगा…”

तभी—

ठक… ठक… ठक…

दरवाज़े पर दस्तक हुई।

आरमान ने घड़ी देखी।

11:43 PM

इतनी रात को कौन?

उसका कोई दोस्त नहीं।
कोई रिश्तेदार नहीं।
कोई इंतज़ार नहीं।

दस्तक फिर हुई।

इस बार ज़रा ज़ोर से।

आरमान धीरे-धीरे दरवाज़े तक गया।
उसका दिल बिना वजह तेज धड़कने लगा।

जैसे कोई अनजाना डर अंदर जन्म ले चुका हो।

उसने दरवाज़ा खोला।

सामने एक 60 साल का आदमी खड़ा था।

सूट पहने हुए।
बारिश से बचने के बावजूद उसके जूते बिल्कुल साफ थे।
आँखों में अजीब सी गंभीरता।

“क्या आप आरमान मल्होत्रा हैं?”

आरमान चौंका।

“जी… लेकिन आप कौन?”

“मेरा नाम संजीव खन्ना है। मैं आपके पिता का वकील हूँ।”

कुछ सेकंड तक सन्नाटा।

फिर आरमान ज़ोर से हँस पड़ा।

“मेरे पिता? वो तो फैक्ट्री में काम करते थे… 15 साल पहले एक्सीडेंट में मर गए।”

वकील की आँखों में कोई बदलाव नहीं आया।

“मैं आपके असली पिता की बात कर रहा हूँ।”

कमरे की हवा अचानक भारी हो गई।

“क्या मतलब?”

वकील ने धीरे से अंदर कदम रखा।
दरवाज़ा बंद किया।

बैग खोला।

उसमें से एक फाइल निकाली।

उसने फाइल टेबल पर रखी।

“आपके असली पिता का नाम राजवीर मल्होत्रा था।”

आरमान का दिल एक पल को रुक गया।

“क्या…?”

“हाँ। वही राजवीर मल्होत्रा… जिनकी मल्होत्रा इंडस्ट्रीज़ पूरे शहर में फैली है।”

आरमान के होंठ सूख गए।

“आप मजाक कर रहे हैं…”

वकील ने एक फोटो आगे बढ़ाई।

फोटो में एक आलीशान हवेली थी।

उसके सामने खड़ा था एक रौबदार आदमी।

सूट में।
आत्मविश्वास से भरा।

आरमान ने फोटो को गौर से देखा।

फिर धीरे-धीरे उसकी सांसें भारी होने लगीं।

चेहरा…

नाक…

आँखें…

वो आदमी उससे मिलता-जुलता था।

बहुत ज्यादा।

“ये… ये कैसे हो सकता है…”

वकील की आवाज़ अब और भी धीमी थी।

“क्योंकि सच छुपाया गया था।”

“आपकी माँ ने आपको बचाने के लिए सब छुपा दिया।”

“और मल्होत्रा परिवार ने आपको मर चुका घोषित कर दिया।”

कमरे में घड़ी की टिक-टिक साफ सुनाई दे रही थी।

आरमान के दिमाग में बचपन की यादें घूमने लगीं।

माँ की घबराई हुई आवाज़।

कभी किसी का नाम लेते-लेते रुक जाना।

रातों को रोना।

“तो… उन्होंने मुझे कभी ढूँढा नहीं?”

वकील की आँखें झुक गईं।

“उन्होंने ढूँढा था।”

“लेकिन उन्हें बताया गया… कि आप दोनों एक सड़क हादसे में मर गए।”

आरमान की मुट्ठियाँ भींच गईं।

“किसने बताया?”

वकील जवाब देता—

उससे पहले—

बाहर ब्रेक की तेज़ आवाज आई।

चिर्ररररररररर!

दोनों ने खिड़की की तरफ देखा।

काली SUV।

उसमें से दो आदमी उतरे।

उनकी चाल में जल्दबाज़ी थी।

वकील का चेहरा सफेद पड़ गया।

“उन्हें पता चल गया…”

“कौन?”

“जो नहीं चाहते कि आप जिंदा रहें।”

आरमान का दिल अब कानों में धड़क रहा था।

“क्यों?”

वकील ने फाइल उसकी तरफ धकेली।

“क्योंकि राजवीर मल्होत्रा की पूरी जायदाद… अब आपके नाम है।”

दरवाज़े पर ज़ोरदार लात पड़ी।

धड़ाम!!!

लकड़ी टूट गई।

दो नकाबपोश अंदर घुस आए।

हाथ में बंदूक।

“फाइल दो!”

वकील ने आरमान की तरफ देखा।

“भागो!”

आरमान के पैर खुद-ब-खुद पीछे की तरफ दौड़ पड़े।

बारिश तेज हो चुकी थी।

दिल दिमाग से तेज दौड़ रहा था।

आज तक वो एक बेरोजगार लड़का था।

लेकिन आज—

कोई उसे मारना चाहता था।

क्योंकि वो…

छुपा हुआ अमीरज़ादा था।

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